शिक्षा संस्थानों की लचर निगरानी: फर्जी विश्वविद्यालयों का बढ़ता जाल और आतंकी लिंक
देश में शिक्षा संस्थानों की निगरानी को लेकर एक बार फिर सवाल खड़े हो गए हैं। विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी), अखिल भारतीय तकनीकी शिक्षा परिषद (एआईसीटीई) और राष्ट्रीय शिक्षक शिक्षा परिषद (एनसीटीई) जैसी नियामक संस्थाओं के होते हुए भी फर्जी विश्वविद्यालयों द्वारा डिग्री बांटने के मामले लगातार सामने आ रहे हैं। यूजीसी हर साल ऐसे फर्जी विश्वविद्यालयों की सूची जारी करता है और कुछ पर कार्रवाई भी करता है, लेकिन इसके बावजूद देश में वर्तमान में 22 फर्जी विश्वविद्यालय सक्रिय हैं, जिनमें से 10 अकेले दिल्ली में संचालित हो रहे हैं।
इसी कड़ी में, फरीदाबाद स्थित अल फलाह यूनिवर्सिटी हाल ही में संदेह के घेरे में आई है। दिल्ली में लाल किले के पास हुए धमाके के बाद जांच एजेंसियों को इस यूनिवर्सिटी में आतंकी मॉड्यूल के सक्रिय होने का अंदेशा है। आरोप है कि दिल्ली बम धमाके का मुख्य आरोपी डॉ. उमर नबी और उसके कुछ साथी इसी यूनिवर्सिटी में चिकित्सक के तौर पर कार्यरत थे। इस संबंध में यूनिवर्सिटी के कई अन्य डॉक्टर और कर्मचारी भी जांच एजेंसियों की रडार पर हैं। जांच का मुख्य उद्देश्य यह पता लगाना है कि यह प्रतिष्ठित शिक्षा संस्थान सफेदपोश आतंकी मॉड्यूल का ठिकाना कैसे बन गया।
प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) ने इस मामले में बड़ी वित्तीय अनियमितताओं का खुलासा किया है। सूत्रों के अनुसार, यूनिवर्सिटी में 415 करोड़ रुपये से अधिक की वित्तीय गड़बड़ी पाई गई है। ईडी का आरोप है कि अल फलाह यूनिवर्सिटी ने राष्ट्रीय मूल्यांकन एवं प्रत्यायन परिषद (नैक) और यूजीसी की धारा 12(बी) के तहत मान्यता और सरकारी अनुदान प्राप्त करने की बात को गलत तरीके से प्रस्तुत किया। जांच में यह भी सामने आया है कि अल फलाह स्कूल ऑफ इंजीनियरिंग एंड टेक्नोलॉजी की नैक मान्यता 2013 से 2018 तक ही वैध थी, और शिक्षा विभाग की मान्यता भी 2011 से 2015 तक ‘ए’ ग्रेड के साथ ही थी।
आरोप है कि यूनिवर्सिटी प्रशासन ने अपनी मान्यताओं के नवीनीकरण कराए बिना ही अपने प्रपत्रों में ‘ए’ ग्रेड होने का दावा किया और इसी आधार पर छात्रों से करोड़ों की फीस वसूली। प्रारंभिक जांचों से पता चलता है कि यूनिवर्सिटी ने वित्तीय वर्ष 2018 से 2025 के बीच 415.10 करोड़ रुपये का शैक्षिक राजस्व अर्जित किया। 2018 के बाद इस राजस्व में उल्लेखनीय वृद्धि देखी गई, जहां 2018-19 में वार्षिक राजस्व 24.1 करोड़ रुपये था, वहीं 2024-25 में यह बढ़कर 81.10 करोड़ रुपये तक पहुंच गया। इसके अतिरिक्त, यूनिवर्सिटी के हॉस्टल और मेस की फीस को लेकर भी अनियमितताओं के संकेत मिले हैं।
अल फलाह यूनिवर्सिटी की स्थापना 2014 में हरियाणा विधानसभा के एक अधिनियम के तहत की गई थी और इसे यूजीसी द्वारा मान्यता प्राप्त थी। यह एसोसिएशन ऑफ इंडियन यूनिवर्सिटीज (एआईयू) की सदस्य भी थी, जहां यूजी, पीजी और पीएचडी स्तर के पाठ्यक्रम संचालित होते थे। यह अत्यंत चिंताजनक है कि जिस संस्थान का उद्देश्य देश के लिए श्रेष्ठ मानव संसाधन तैयार करना था, वह सफेदपोश आतंकी मॉड्यूल की शरणस्थली बन गया। अल फलाह का यह मामला देश के अन्य उच्च शिक्षण संस्थानों की गहन जांच की आवश्यकता को रेखांकित करता है।
यह स्वाभाविक है कि उच्च शिक्षा संस्थाओं को मान्यता देने और उनकी निगरानी करने वाली नियामक संस्थाओं की भूमिका पर भी सवाल उठ रहे हैं। किसी मान्यता प्राप्त विश्वविद्यालय में आतंकी मॉड्यूल का पनपना नियामक संस्थाओं की उदासीनता को दर्शाता है। अल फलाह का मामला स्पष्ट करता है कि नियामक संस्थाओं के पास एक ठोस और प्रभावी निगरानी तंत्र का अभाव है। यदि यह तंत्र सही ढंग से कार्य कर रहा होता, तो संभवतः अल फलाह यूनिवर्सिटी आतंकियों का अड्डा नहीं बनती और न ही वहां इतनी गंभीर अनियमितताएं सामने आतीं।
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