सुप्रीम कोर्ट की यूपी सरकार को फटकार: ट्रैफिक अपराध माफी पर उठाए सवाल
सुप्रीम कोर्ट ने उत्तर प्रदेश सरकार के उस फैसले पर कड़ी नाराजगी जताई है, जिसके तहत एक जनवरी 2017 से 31 दिसंबर 2021 तक के न्यायालयों में लंबित यातायात नियमों के उल्लंघन संबंधी मामलों को माफ कर दिया गया था। अधिवक्ता केसी जैन द्वारा दायर एक याचिका पर सुनवाई करते हुए, शीर्ष अदालत ने कहा कि इस तरह के फैसले से अपराधियों के मन से कानून का डर पूरी तरह खत्म हो जाएगा।
न्यायमूर्ति जे.बी. पारदीवाला और के.बी. विश्वनाथन की पीठ ने तीखी टिप्पणी करते हुए कहा, “यदि ट्रैफिक अपराध अशमनीय है, तो हम आश्चर्य करते हैं कि राज्य किस प्रकार एक संशोधन लाकर एक ही झटके में अदालत को बता सकता है कि इनके संबंध में लंबित कार्यवाही समाप्त हो गई है। इसका परिणाम यह होगा कि नशे में वाहन चलाने के आरोप में बुक किया गया व्यक्ति बिना किसी दंड के बच निकलेगा, भले ही मामला 5 वर्षों से लंबित हो। परंतु क्या केवल लंबी अवधि बीत जाना कार्यवाही समाप्त करने का औचित्य बन सकता है? इस प्रकार एकमुश्त कार्यवाहीयों की समाप्ति से ऐसे अपराधों के प्रति डर पूरी तरह समाप्त हो जाएगा।”
याचिकाकर्ता अधिवक्ता जैन ने इस कानून के विरुद्ध अदालत का दरवाजा खटखटाया था, जो उत्तर प्रदेश में 2023 में लागू किया गया था। उनका तर्क था कि यह कानून मोटर वाहन अधिनियम के तहत दंडनीय अपराधों के प्रति लोगों को उदासीन बना देगा।
सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि भारत जैसे देश में यातायात एक बड़ी समस्या है। बड़े शहरों सहित कस्बों में भी ट्रैफिक का नियमन अत्यंत चुनौतीपूर्ण है। नागरिक भी यातायात नियमों एवं विनियमों का पालन करने में उतने अनुशासित नहीं हैं। ऐसी परिस्थिति में यह आवश्यक है कि अपराधियों में कानून का डर बना रहे। यह अत्यधिक शक्तिशाली कारों का युग है, और यह आम अनुभव है कि चालक इन शक्तिशाली कारों को नियंत्रित नहीं कर पाते, जिससे दुर्घटनाएँ होती हैं।
न्यायालय ने आगे कहा कि सुनवाई के दौरान जो तथ्य संज्ञान में आए हैं, उनसे यह स्पष्ट होता है कि 31 दिसंबर 2021 की स्थिति में मोटर वाहन अधिनियम के अंतर्गत दंडनीय अपराधों के मुकदमों की समाप्ति का प्रभाव अत्यंत गंभीर होने वाला है। शीर्ष अदालत ने उत्तर प्रदेश के परिवहन और विधि विभाग को इस मामले में शपथ पत्र प्रस्तुत करने का आदेश दिया है।
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