संविधान का सामर्थ्य समझें, मनमानी व्याख्या से बचें: मोदी
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देशवासियों को संविधान के महत्व और सामर्थ्य को समझने की अपील करते हुए कहा है कि इसकी मनमानी व्याख्या से बचना चाहिए। 2015 में प्रधानमंत्री मोदी द्वारा शुरू किया गया संविधान दिवस, देश के नागरिकों को हमारे सर्वोच्च कानून के मूल्यों और प्रासंगिकता से परिचित कराने का एक महत्वपूर्ण अवसर है। यह स्वीकार करना आवश्यक है कि भारत की एक सफल लोकतंत्र के रूप में पहचान के पीछे हमारे संविधान की महती भूमिका रही है।
संविधान की शक्ति ने ही भारत जैसे विविधतापूर्ण राष्ट्र को एकता के सूत्र में पिरोए रखा है। यह एक लंबी और गहन विचार-विमर्श की प्रक्रिया का परिणाम था। संविधान को एक ‘जीवित दस्तावेज’ के रूप में परिभाषित किया गया है, जिसका अर्थ है कि इसमें देश, काल और परिस्थितियों के अनुरूप संशोधन की गुंजाइश है। अब तक किए गए सौ से अधिक संशोधन इस बात के प्रमाण हैं कि विभिन्न सरकारों ने आवश्यकतानुसार इसमें बदलाव किए हैं। यह प्रक्रिया भविष्य में भी जारी रहेगी।
हालांकि, यह चिंताजनक है कि कुछ विपक्षी नेता, विशेष रूप से कांग्रेस के राहुल गांधी, संविधान को ‘खतरे में’ बताकर अनावश्यक भय का माहौल बना रहे हैं। सूत्रों के अनुसार, यह राजनीतिक लाभ के लिए किया जा रहा एक शिगूफा है, क्योंकि वे उसी संविधान के आधार पर सांसद और नेता प्रतिपक्ष जैसे पद पर आसीन हैं। संवैधानिक संस्थाओं, जैसे चुनाव आयोग, को भी निशाना बनाया जा रहा है, जो अपने संवैधानिक दायित्वों का निर्वहन कर रहा है। यह रवैया संविधान की मूल भावना के विपरीत है।
संविधान की सार्थकता तभी सिद्ध होती है जब उसका उपयोग उसकी भावना के अनुरूप हो। यह कड़वी सच्चाई है कि अतीत में संविधान का दुरुपयोग और मनमानी व्याख्या की गई है। 1975 में आपातकाल के दौरान संविधान का न केवल निरादर किया गया, बल्कि उसका मनचाहा इस्तेमाल भी किया गया। यह नागरिकों का कर्तव्य है कि वे अपने अधिकारों और कर्तव्यों के प्रति सजग रहें और संविधान की रक्षा करें, ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि यह किसी भी व्यक्ति या दल की मनमानी का शिकार न हो।
