स्कूलों में रैगिंग: चार राज्यों में छात्रों की आत्महत्याएं, सुसाइड नोटों ने खोली पोल
जयपुर, दिल्ली, मध्य प्रदेश और राजस्थान से सामने आए चार अलग-अलग मामलों में छात्रों की आत्महत्याओं ने स्कूलों में रैगिंग और मानसिक उत्पीड़न की भयावह तस्वीर पेश की है। एक ओर जहां जयपुर में चौथी कक्षा के छात्र ने स्कूल की इमारत से कूदकर जान दी, वहीं दिल्ली में 16 वर्षीय किशोर ने मेट्रो के आगे कूदकर अपनी इहलीला समाप्त कर ली। मध्य प्रदेश में 11वीं की छात्रा ने घर पर फांसी लगाकर जान दी, जबकि राजस्थान के एक गांव में 14 वर्षीय बच्चे का शव पेड़ से लटका मिला। इन सभी दुखद घटनाओं में एक बात समान थी – बच्चों द्वारा प्रताड़ना और मानसिक उत्पीड़न का आरोप, और शिक्षकों से मदद की गुहार लगाने के बावजूद अनसुना किया जाना।
जांच में मिले सुसाइड नोटों से पता चलता है कि स्कूल में रैगिंग की समस्या किस कदर बढ़ रही है और इसे गंभीरता से नहीं लिया जा रहा है। ये छात्र न केवल सहपाठियों द्वारा, बल्कि कुछ मामलों में तो शिक्षकों द्वारा भी शारीरिक और मानसिक रूप से प्रताड़ित किए जा रहे थे। सबसे चिंताजनक बात यह है कि जिन शिक्षकों को बच्चों की सुरक्षा और मार्गदर्शन का जिम्मा सौंपा गया था, वही कई बार उत्पीड़न के आरोपी पाए गए। ये मामले दर्शाते हैं कि रैगिंग अब कोई अलग-थलग समस्या नहीं रह गई है, बल्कि एक ऐसी महामारी बन गई है जो हमारे बच्चों को जीवन से दूर धकेल रही है।
मध्य प्रदेश के रीवा में एक निजी स्कूल की 11वीं की छात्रा ने अपनी सुसाइड नोट में शिक्षक पर गंभीर आरोप लगाए थे। 16 नवंबर को अपने घर में फंदे से लटकी पाई गई इस छात्रा ने कक्षा में शिक्षकों द्वारा की गई शारीरिक और मानसिक प्रताड़ना का विस्तार से वर्णन किया था। उसने लिखा था कि कैसे शिक्षक उसका हाथ पकड़कर उसे मारते थे और उसकी कलाई पकड़े रहते थे। सजा के तौर पर शिक्षक उसकी उंगलियों के बीच पेन रखकर दबाव डालते थे। छात्रा के परिजनों का कहना है कि घर पर उसे कोई समस्या नहीं थी और वह परिवार की लाडली थी। उनकी मौत का कारण स्कूल में हो रहा उत्पीड़न ही था।
इसी तरह, दिल्ली के सेंट कोलंबस स्कूल के 10वीं के छात्र ने मेट्रो के आगे कूदकर आत्महत्या कर ली। छात्र ने अपनी सुसाइड नोट में कई वर्षों से शिक्षकों द्वारा मानसिक उत्पीड़न का आरोप लगाया था। उसने अपने बैग में रखे नोट में तीन शिक्षकों और प्रधानाचार्य को अपनी मौत का जिम्मेदार ठहराया था। उसने अपने परिवार से अपने अंगों को जरूरतमंदों को दान करने की भी गुजारिश की थी। छात्र के पिता ने बताया कि उसके बेटे को बेवजह डांटा जाता था और उनकी बार-बार शिकायत करने के बावजूद शिक्षक उसे परेशान करते रहे। परिवार ने परीक्षा समाप्त होने के बाद उसे दूसरे स्कूल में भेजने की योजना बनाई थी। उन्होंने कहा कि उनका बेटा थोड़ा शरारती था, जैसा कि इस उम्र के बच्चों में होता है, लेकिन शिक्षकों ने उसे लगातार परेशान किया।
ये घटनाएं स्कूलों में एक सुरक्षित और सहायक वातावरण बनाने की तत्काल आवश्यकता को रेखांकित करती हैं। बच्चों की मानसिक सेहत और उनकी सुरक्षा को प्राथमिकता देना आज की सबसे बड़ी जरूरत है।
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