सहरसा में आंगनबाड़ी केंद्रों का फर्जीवाड़ा: कागज पर 40, हकीकत में 10 बच्चे
सरकारी कागजों में पोषण, शिक्षा और देखभाल से भरे आंगनबाड़ी केंद्र, लेकिन सहरसा के सत्तरकटैया प्रखंड में जब जमीनी हकीकत की पड़ताल की गई तो तस्वीर बिल्कुल अलग निकली। विभागीय मानक के अनुसार प्रत्येक आंगनबाड़ी केंद्र में 40 बच्चों की उपस्थिति अनिवार्य है, मगर हकीकत में अधिकांश केंद्र मात्र 10 से 15 बच्चों के भरोसे चल रहे हैं। यह स्थिति दर्शाती है कि व्यवस्था केवल कागजों तक सिमट कर रह गई है।
इस गोरखधंधे को जारी रखने के लिए, कई केंद्रों में उपस्थिति पूरी दिखाने के लिए एक ही परिवार के चार-पांच बच्चों को बैठाकर उपस्थिति पक्की कर ली जाती है। इसका मुख्य उद्देश्य यह दिखाना है कि व्यवस्था सुचारू रूप से चल रही है और कागजात मजबूत बने रहें। प्रखंड में कुल 185 आंगनबाड़ी केंद्र संचालित हैं, जो एक बड़ा नेटवर्क प्रतीत होता है। हालांकि, इन केंद्रों की निगरानी के नाम पर केवल खानापूर्ति होती है। सीडीपीओ और चार महिला पर्यवेक्षिकाओं की तैनाती के बावजूद, केंद्रों की स्थिति से यह स्पष्ट होता है कि निरीक्षण कभी गंभीरता से नहीं हुआ। स्थानीय लोगों का भी यही कहना है कि यदि नियमित और निष्पक्ष निरीक्षण होता, तो 40 बच्चों की जगह 10 बच्चे मिलना संभव नहीं होता।
सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार, सत्तरकटैया प्रखंड के आंगनबाड़ी केंद्र एक ‘फिक्स नजराना’ व्यवस्था पर चल रहे हैं। हर माह मिलने वाली सरकारी राशि का 15 से 20 प्रतिशत हिस्सा ऊपरी अधिकारियों तक पहुंचाने का नियम सा बन गया है। कुछ सेविकाओं ने नाम गुप्त रखने की शर्त पर इस बात को स्वीकार भी किया है। उनका कहना है कि यदि यह नजराना समय पर नहीं दिया जाता है, तो उन्हें विभिन्न प्रकार से परेशान किया जाता है। हालांकि, अधिकारियों के डर से कोई भी सेविका खुलकर शिकायत दर्ज कराने की हिम्मत नहीं जुटा पाती है।
स्थानीय लोगों द्वारा कई बार इस संबंध में शिकायतें की गई हैं, लेकिन विभागीय स्तर पर कोई ठोस कार्रवाई न होने से यह स्पष्ट है कि मिलीभगत की जड़ें काफी गहरी हैं। कम बच्चों की उपस्थिति के बावजूद, पोषण सामग्री के खर्च का पूरा हिसाब दिखा दिया जाता है, जिससे सरकारी राशि का दुरुपयोग भी हो रहा है। यह स्थिति सरकारी योजनाओं के उद्देश्य पर ही प्रश्नचिन्ह लगाती है, जो बच्चों के पोषण और शिक्षा के लिए बनाई गई हैं।
