पाकिस्तान-बांग्लादेश में ‘defence deal’ की सुगबुगाहट, भारत के लिए क्या हैं मायने?
पाकिस्तान और बांग्लादेश के बीच एक रक्षा समझौते की सुगबुगाहट ने भारत की सुरक्षा चिंताओं को बढ़ा दिया है। पिछले कुछ महीनों में पाकिस्तान के शीर्ष रक्षा अधिकारियों ने बांग्लादेश का दौरा किया है। इनमें पाकिस्तान के जॉइंट चीफ्स ऑफ स्टाफ, नौसेना प्रमुख और आईएसआई प्रमुख लेफ्टिनेंट जनरल असीम मलिक शामिल हैं। यह घटनाक्रम ऐसे समय में हो रहा है जब बांग्लादेश में मुहम्मद यूनुस के नेतृत्व में सरकार भारत से दूरी बनाकर पाकिस्तान के साथ संबंध मजबूत करने की कोशिश कर रही है।
यह प्रस्तावित समझौता पाकिस्तान और सऊदी अरब के बीच हुए रणनीतिक रक्षा समझौते के समान हो सकता है। उस समझौते में यह प्रावधान था कि ‘किसी भी देश के खिलाफ आक्रामकता को दोनों देशों के खिलाफ आक्रामकता माना जाएगा’। पाकिस्तान में इसे भारत के खिलाफ एक रणनीतिक निवारक के रूप में देखा गया था। अब पाकिस्तान बांग्लादेश के साथ भी ऐसा ही नाटो-शैली का रक्षा समझौता करने की फिराक में है। 1971 में बांग्लादेश की मुक्ति के बाद यह पहला ऐसा समझौता होगा।
इस संभावित ‘defence deal’ के तहत दोनों देश खुफिया जानकारी साझा कर सकते हैं, संयुक्त सैन्य अभ्यास कर सकते हैं और हथियार समझौतों में प्रवेश कर सकते हैं। हालांकि, इसमें परमाणु सहयोग शामिल होगा या नहीं, इस पर कोई स्पष्टता नहीं है। यदि इसमें परमाणु सहयोग शामिल होता है, तो यह भारत के लिए गंभीर चिंता का विषय होगा। पाकिस्तान ने सऊदी अरब के साथ अपने समझौते के हिस्से के रूप में दावा किया था कि उसकी परमाणु क्षमताएं उपलब्ध होंगी।
बांग्लादेश में आगामी चुनावों से पहले पाकिस्तान इस समझौते को जल्द से जल्द अंतिम रूप देने के लिए उत्सुक है। बांग्लादेश में जारी अशांति और भारत विरोधी भावना ने पाकिस्तान को इस समझौते को आगे बढ़ाने का मौका दिया है। पाकिस्तान की सत्तारूढ़ पार्टी के एक नेता ने हाल ही में दोनों देशों के बीच औपचारिक सैन्य गठबंधन की मांग की, जिससे अटकलों को और बल मिला।
भारत इस घटनाक्रम पर बारीकी से नजर रख रहा है। अधिकारियों के हवाले से कहा गया है कि यदि ऐसा समझौता होता है, तो यह पूर्वी मोर्चे पर एक संभावित सुरक्षा चुनौती बन सकता है। यह पाकिस्तान की भारत के खिलाफ ‘दो-मोर्चे की लड़ाई’ की रणनीति के अनुकूल है। बांग्लादेश में आगामी चुनावों में यदि खालिदा जिया की बांग्लादेश नेशनल पार्टी (बीएनपी) सत्ता में आती है, तो यह समझौता रुक सकता है। हालांकि, पाकिस्तान समर्थित जमात-ए-इस्लामी के साथ बीएनपी के गठबंधन की संभावना भी है।
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