16वें वित्त आयोग की सिफारिश: राज्यों को बिजली कंपनियों का Privatization करना चाहिए
16वें वित्त आयोग ने अपनी रिपोर्ट में सभी राज्यों को बिजली वितरण कंपनियों (डिस्कॉम) के निजीकरण के लिए सक्रिय रूप से प्रयास करने की सिफारिश की है। आयोग का मानना है कि राज्यों पर बिजली सब्सिडी का बढ़ता बोझ वित्तीय स्थिरता के लिए एक बड़ी चुनौती बन गया है। आयोग के अनुसार, वर्ष 2018-19 में कुल विद्युत सब्सिडी 1,29,322 करोड़ रुपये थी, जो वर्ष 2023-24 में बढ़कर 2,62,276 करोड़ रुपये हो गई है। इसके अतिरिक्त, राज्यों द्वारा घाटे की भरपाई के लिए दिए गए अनुदान की राशि भी बड़ी है।
आयोग ने निजीकरण प्रक्रिया को सुगम बनाने के लिए एक विशेष व्यवस्था का सुझाव दिया है। इसके तहत, राज्यों को एक विशेष प्रयोजन व्यवस्था (एसपीवी) बनानी चाहिए, जिसमें डिस्कॉम के पुराने ऋण को समाहित किया जा सके। यह व्यवस्था निजी निवेशकों को संचित ऋण भार से बचाएगी। आयोग ने केंद्र सरकार से भी सिफारिश की है कि वह राज्य द्वारा इस ऋण के पूर्व भुगतान या अंतिम पुनर्भुगतान पर पूंजी निवेश के लिए विशेष प्रोत्साहन योजना के तहत सहायता प्रदान करे।
ऊर्जा क्षेत्र के विशेषज्ञों और उपभोक्ता परिषदों ने इन सिफारिशों पर चिंता व्यक्त की है। उनका कहना है कि यह कदम ऊर्जा क्षेत्र को योजनाबद्ध तरीके से निजी हाथों में सौंपने की साजिश है। विशेषज्ञों के अनुसार, वित्त आयोग की सिफारिशों से स्पष्ट होता है कि वर्षों से घाटे में चल रहे डिस्कॉम का ऋण पहले राज्य सरकारों के सिर मढ़ा जाएगा। सार्वजनिक धन से उसे समायोजित किया जाएगा और उसके बाद साफ-सुथरी बैलेंस शीट के साथ वही डिस्कॉम निजी कंपनियों को सौंप दिए जाएंगे। इस पूरी कवायद में लाभ निजी घरानों को होगा, जबकि नुकसान का बोझ देश के उपभोक्ताओं और राज्य सरकारों पर डाला जाएगा।
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