राज्यपालों व राष्ट्रपति के विधेयकों पर समयसीमा तय नहीं कर सकता सुप्रीम कोर्ट
नई दिल्ली। उच्चतम न्यायालय ने राज्य विधानसभाओं द्वारा पारित विधेयकों पर राज्यपालों और राष्ट्रपति की मंजूरी के संबंध में महत्वपूर्ण संवैधानिक स्थिति स्पष्ट करते हुए कहा है कि इसके लिए कोई निश्चित समयसीमा तय नहीं की जा सकती। न्यायालय ने यह भी स्पष्ट किया कि वह संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत विधेयकों को ‘डीम्ड एसेंट’ यानी मान्य स्वीकृति का आदेश नहीं दे सकता।nnशीर्ष अदालत की पांच न्यायाधीशों की पीठ ने एक प्रेसिडेंशियल रेफरेंस पर सर्वसम्मति से अपनी राय देते हुए कहा कि कोई भी विधेयक राज्यपाल की मंजूरी के बिना कानून का रूप नहीं ले सकता। पीठ ने यह भी कहा कि विधेयकों पर निर्णय लेने के संबंध में राज्यपाल को विवेकाधिकार प्राप्त है और वे इस मामले में मंत्रिपरिषद की सलाह से बंधे नहीं हैं।nnहालांकि, न्यायालय ने इस बात पर भी जोर दिया कि राज्यपाल लंबे समय तक विधेयकों को अनिश्चित काल के लिए लटकाकर नहीं रख सकते। राज्यपाल की इस तरह की निष्क्रियता पर न्यायालय को सीमित न्यायिक समीक्षा का अधिकार है और वह उचित समय-सीमा के भीतर राज्यपाल को अपने विवेकाधिकार का प्रयोग करने का निर्देश दे सकता है।nnयह फैसला देशभर के राज्यों के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह अप्रैल माह में आए दो न्यायाधीशों की पीठ के एक फैसले को निष्प्रभावी करता है। उस फैसले में राज्यों के विधेयकों पर निर्णय लेने के संबंध में राज्यपाल और राष्ट्रपति के लिए समयसीमा तय की गई थी और तमिलनाडु के दस विधेयकों को, जो राज्यपाल द्वारा रोके गए थे, मंजूरी दे दी गई थी। यह पहली बार था जब सीधे अदालत के आदेश से विधेयकों को मंजूरी मिली थी।nnराष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने इस संबंध में सुप्रीम कोर्ट को एक संदर्भ (रेफरेंस) भेजकर 14 कानूनी सवालों पर राय मांगी थी। प्रधान न्यायाधीश बीआर गवई, न्यायमूर्ति सूर्यकांत, न्यायमूर्ति विक्रम नाथ, न्यायमूर्ति पीएस नरसिम्हा और न्यायमूर्ति एएस चंदुरकर की पीठ ने राष्ट्रपति द्वारा उठाए गए 14 में से 13 सवालों के जवाब दिए और एक सवाल को गैर-जरूरी बताकर वापस कर दिया। यह सवाल राज्यों और केंद्र के बीच विवादों को सुलझाने में न्यायालय के अधिकार क्षेत्र से संबंधित था।nnराष्ट्रपति ने अपने संदर्भ में पूछा था कि जब संविधान में राज्यपालों और राष्ट्रपति के लिए विधेयकों पर निर्णय लेने की कोई समयसीमा निर्धारित नहीं है, तो क्या सुप्रीम कोर्ट ऐसी समयसीमा तय कर सकता है। यद्यपि संदर्भ में सीधे तौर पर तमिलनाडु के फैसले को चुनौती नहीं दी गई थी, परंतु पूछे गए प्रश्न उस फैसले के इर्द-गिर्द ही केंद्रित थे। संदर्भ में अनुच्छेद 200 और 201 के तहत राज्य विधानसभाओं से पारित विधेयकों पर राज्यपाल और राष्ट्रपति के निर्णय लेने की शक्तियों से संबंधित सवाल उठाए गए थे।nnसर्वसम्मति से दी गई राय में, पांच न्यायाधीशों की पीठ ने दो न्यायाधीशों की पीठ द्वारा राज्य विधेयकों पर मंजूरी के लिए राज्यपालों और राष्ट्रपति के लिए समयसीमा तय करने और विधेयकों को स्वतः स्वीकृत (डीम्ड एसेंट) मानने को गलत ठहराया।”
ठहराया है।
दिल्ली: छात्र की आत्महत्या पर प्रिंसिपल और तीन शिक्षक निलंबित, FIR दर्ज
कनाडा में रह रहे दंपती को दिल्ली HC से बड़ी राहत, वर्चुअल पेशी को मिली मंजूरी
हाई कोर्ट ने BJP प्रवक्ता पर ट्रायल कोर्ट की कार्रवाई रोकी, अगली सुनवाई 23 मार्च को
भारत-बांग्लादेश NSA की मुलाकात: द्विपक्षीय संबंधों को मजबूत करने पर जोर
पश्चिमी दिल्ली में युवक की गोली मारकर हत्या, तीन नाबालिग गिरफ्तार
आतंकवाद की नई चाल: दिल्ली हमले ने बढ़ाई चिंता, सतर्कता जरूरी
प्रदूषण की सीमाएं नहीं, एयरशेड मॉडल से समाधान की जरूरत
ऑपरेशन साइबर हॉक: दिल्ली पुलिस ने 700 से अधिक साइबर अपराधियों को दबोचा, 1000 करोड़ के संदिग्ध लेनदेन का खुलासा
