एशियन गेम्स में 800 करोड़ के भारी-भरकम निवेश के बाद भी गोल्ड के लिए जूझ रहा भारत | national sports news
भारतीय खेल जगत में इस समय एक बड़ा सवाल गूंज रहा है कि क्या भारी-भरकम वित्तीय निवेश के बावजूद हमारे एथलीट वह परिणाम दे पा रहे हैं जिसकी उम्मीद की जा रही थी [national sports news]। हाल ही में एशियाई खेलों के लिए खिलाड़ियों की ट्रेनिंग, अंतरराष्ट्रीय एक्सपोजर, कोचिंग और आधुनिक उपकरणों पर लगभग 800.70 करोड़ रुपये खर्च किए गए हैं। इसके पीछे का मुख्य उद्देश्य यह सुनिश्चित करना था कि भारतीय खिलाड़ी वैश्विक मंच पर शीर्ष पर रहें। [national sports news]
प्रतियोगिता के शुरुआती दिनों में भारत ने कुल 17 पदक अपने नाम किए हैं, जिसमें 7 रजत और 9 कांस्य शामिल हैं। हालांकि, इकलौता स्वर्ण पदक महिला क्रिकेट टीम ने श्रीलंका को हराकर जीता है। पिछले संस्करण यानी हांगझोउ एशियन गेम्स के ऐतिहासिक प्रदर्शन के बाद उम्मीदों का स्तर काफी ऊंचा हो चुका है। उस दौरान भारत ने 106 पदक जीतकर अपनी एक अलग पहचान बनाई थी, जिसमें 28 स्वर्ण शामिल थे। वर्तमान आयोजनों में पदकों की संख्या भले ही आ रही हो, लेकिन शीर्ष पायदान यानी गोल्ड मेडल हासिल करने की रफ्तार धीमी पड़ना चिंता का विषय है।
खेल विशेषज्ञों का मानना है कि इस भारी बजट का एक बड़ा हिस्सा युवा प्रतिभाओं को तराशने और उन्हें भविष्य के लिए तैयार करने पर भी खर्च हो रहा है। इस दल में 501 खिलाड़ियों में से 310 ऐसे हैं जो अपना पहला एशियन गेम्स खेल रहे हैं, जिससे यह स्पष्ट होता है कि नीति निर्माताओं की नजर दीर्घकालिक सुधारों पर भी है। हालांकि, जनता और खेल प्रेमियों के बीच यह सवाल स्वाभाविक है कि क्या पैसों का यह निवेश सीधे तौर पर स्वर्ण पदकों में तब्दील हो रहा है या हमें अपनी खेल रणनीतियों में अभी और सुधार की आवश्यकता है। आने वाले दिनों में जब अन्य स्पर्धाएं शुरू होंगी, तो यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या भारत अपनी खोई हुई स्वर्ण गति को वापस पा सकता है या नहीं।
