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एनडीए की सुनामी में महिषी का चमत्कार: डॉ. गौतम कृष्णा ने कैसे जीती जंग?

By Nov 19, 2025

बिहार विधानसभा चुनाव 2025 में राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) की सुनामी ने पूरे राज्य को झकझोर दिया। एनडीए ने 243 सीटों में से 202 पर कब्जा जमाया, जिसमें भाजपा, जद(यू) और उनके सहयोगियों ने अधिकांश सीटें जीतीं। महागठबंधन बुरी तरह बिखर गया, लेकिन इस राजनीतिक तूफान के बीच सहरसा जिले की महिषी विधानसभा सीट पर एक अद्भुत घटना घटी।

यहां राष्ट्रीय जनता दल (आरजेडी) के उम्मीदवार और पूर्व ब्लॉक डेवलपमेंट ऑफिसर (बीडीओ) डॉ. गौतम कृष्णा ने एनडीए के दिग्गज को धूल चटा दी। यह जीत न केवल एक राजनीतिक उलटफेर है, बल्कि एक साधारण आदमी की दृढ़ता और जनता के विश्वास का प्रतीक भी है। सूत्रों के अनुसार, डॉ. कृष्णा ने एनडीए के उम्मीदवार गुंजेश्वर साह को 3,740 वोटों के अंतर से हराया। डॉ. गौतम को 93,752 वोट मिले, जबकि गुंजेश्वर साह को 90,012 वोटों पर संतोष करना पड़ा।

2025 के चुनाव में एनडीए ने ऐतिहासिक जीत दर्ज की। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की जद(यू) और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की भाजपा ने विकास, कानून-व्यवस्था और सामाजिक न्याय के वादे के साथ जनता को लुभाया। महागठबंधन, जिसमें आरजेडी, कांग्रेस और अन्य दल शामिल थे, केवल 30-40 सीटों पर सिमट गया, लेकिन महिषी में कहानी अलग थी। 2020 में, जद(यू) के गुंजेश्वर साह ने डॉ. गौतम को मामूली अंतर से हराया था।

डॉ. गौतम कृष्णा का जन्म सहरसा के बाढ़ प्रभावित महिषी इलाके में एक साधारण परिवार में हुआ था। उनके पिता विष्णुदेव यादव एक किसान थे, जिन्होंने बाढ़ की कठिनाइयों का सामना करते हुए भी अपने बेटे को शिक्षा का महत्व सिखाया। डॉ. गौतम ने पटना विश्वविद्यालय से राजनीति शास्त्र में पीएचडी की और बिहार सरकार में बीडीओ के रूप में प्रशासनिक सेवा में प्रवेश किया। लेकिन 2015 में, उन्होंने नौकरी छोड़ दी क्योंकि उनका सपना था अपने क्षेत्र की गरीबी, बेरोजगारी और बाढ़ जैसी समस्याओं को जड़ से उखाड़ना।

डॉ. गौतम कृष्णा ने एक साक्षात्कार में कहा, “मैं अधिकारी बनकर फाइलों में कैद नहीं रहना चाहता था, मैं जनता के बीच रहकर लड़ना चाहता था।” 2020 में हार के बावजूद, उन्होंने हिम्मत नहीं हारी। उन्होंने इलाके के गांवों में घूमकर लोगों से संपर्क किया। उनकी सादगी ने सभी को मोहित कर लिया – वे आज भी चप्पल पहनते हैं, साइकिल से प्रचार करते हैं और खुद को ‘गरीब मजदूर’ कहते हैं। चुनाव आयोग के आंकड़ों के अनुसार, उनके खिलाफ कुछ आपराधिक मामले दर्ज हैं, लेकिन उन्हें राजनीतिक साजिशों से जोड़ा जाता है। उनकी संपत्ति लगभग 1.3 करोड़ रुपये है, जो एक विधायक के लिए सादगी का उदाहरण है।

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