लाखों की मशीनें धूल फांक रहीं: 83 लाख की रोशनी पर ‘ताला’
शहर के दीनदयाल अस्पताल में नेत्र रोग विभाग को आधुनिक बनाने के लिए खरीदी गई 83 लाख रुपये की मशीनें पिछले चार वर्षों से धूल फांक रही हैं। इनमें 40-50 लाख रुपये की फेको मशीन, 15 लाख रुपये की पेरिमीटर मशीन और 18 लाख रुपये की यागलेजर मशीन शामिल हैं। फेको मशीन से मोतियाबिंद का ऑपरेशन बिना चीरे के संभव है, जबकि पेरिमीटर मशीन ग्लूकोमा मरीजों के लिए महत्वपूर्ण है। यागलेजर मशीन मोतियाबिंद ऑपरेशन के बाद आंख में बनने वाली झिल्ली को हटाने के काम आती है। इन मशीनों के बंद पड़े रहने से मरीजों को निजी केंद्रों पर इलाज के लिए अतिरिक्त खर्च करना पड़ रहा है।
अस्पताल प्रशासन का कहना है कि मशीनों के संचालन के लिए विशेषज्ञ की आवश्यकता है, लेकिन जब मशीनें खरीदी गईं तब इस पर विचार नहीं किया गया। यहां तैनात नेत्र सर्जन को भी इन मशीनों के संचालन का प्रशिक्षण नहीं दिया गया है। इस कारण लाखों के संसाधन होने के बावजूद मरीजों को इसका लाभ नहीं मिल पा रहा है।
पहले जहां नेत्र विभाग की ओपीडी 350-400 मरीजों तक पहुंचती थी, वहीं अब सुविधाओं के अभाव में मरीजों की संख्या घट रही है। इससे अस्पताल की साख पर भी सवाल उठ रहे हैं। आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग के मरीजों को अब जांच और इलाज के लिए निजी केंद्रों पर जाना पड़ रहा है, जो उनके लिए एक अतिरिक्त बोझ है।
अस्पताल के सीएमएस डॉ. एमके माथुर ने बताया कि विशेषज्ञ न होने से मशीनों का संचालन नहीं हो पा रहा है। पूर्व में तैनात विशेषज्ञ ट्रांसफर हो चुके हैं और नई तैनाती नहीं हो सकी है। शासन को प्रस्ताव भेजा गया है। डॉ. सुंदर मशीनों को संचालित नहीं कर सकते।
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