मास स्पेक्ट्रोमेट्री से ब्रेन टीबी की जांच होगी और सटीक, लखनऊ में अध्ययन सफल
उत्तर प्रदेश में ब्रेन टीबी यानि ट्यूबरकुलस मेनिन्जाइटिस (टीबीएम) के गंभीर मामले चिंता का विषय बने हुए हैं। वर्ष 2024 में प्रदेश में दर्ज किए गए लगभग 6.7 लाख टीबी मामलों में से लगभग 35,000 ब्रेन टीबी के हैं, जिनमें बच्चों और वयस्कों का एक बड़ा हिस्सा शामिल है। इस जानलेवा बीमारी की पहचान में देरी या सटीकता की कमी के कारण मृत्युदर काफी अधिक है, खासकर तीसरे स्टेज में यह 75 प्रतिशत तक पहुंच जाती है।
इस गंभीर समस्या के समाधान की दिशा में लोहिया आयुर्विज्ञान संस्थान, लखनऊ के चिकित्सकों ने एक महत्वपूर्ण अध्ययन किया है। संस्थान के विशेषज्ञों द्वारा विकसित की गई मास स्पेक्ट्रोमेट्री तकनीक, ब्रेन टीबी की जांच को पहले से कहीं अधिक सटीक और तेज बनाने का वादा करती है। यह नई विधि पारंपरिक इम्यूनोहिस्टोकेमिस्ट्री जैसी विधियों की तुलना में अधिक प्रभावी है, क्योंकि यह एक ही माप से कई अणुओं का पता लगाने में सक्षम है।
संस्थान के सीएमएस एवं जनरल मेडिसिन विभाग के अध्यक्ष प्रो. विक्रम सिंह, जनरल मेडिसिन विभाग में एडिशनल प्रो. डा. मृदु सिंह, बायोकेमेस्ट्री विभाग के अध्यक्ष एडिशनल प्रो. मनीष कुलश्रेष्ठ और डॉ. जूही वर्मा द्वारा किए गए इस साझा अध्ययन को प्रतिष्ठित अंतरराष्ट्रीय जर्नल न्यूरोलाजिकल साइंसेज में प्रकाशित किया गया है। डॉक्टरों का दावा है कि यह अध्ययन ब्रेन टीबी के उपचार में एक मील का पत्थर साबित हो सकता है।
अध्ययन के अनुसार, कुल टीबी के मामलों का लगभग एक-पांच प्रतिशत ब्रेन टीबी के रोगी होते हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) की रिपोर्ट के मुताबिक, 2024 में देश में टीबी के मरीजों की संख्या लगभग 27 लाख थी, जिसमें उत्तर प्रदेश की हिस्सेदारी सबसे अधिक रही।
डॉ. मनीष कुलश्रेष्ठ ने बताया कि इस अध्ययन में 172 मरीजों को शामिल किया गया था। उनके मस्तिष्क मेरू द्रव्य (सीएसएफ) नमूनों की जांच मास स्पेक्ट्रोमेट्री तकनीक से की गई। विशेष रूप से माइकोलिक और टीबीएसए जैसे बायोमार्कर की जांच से सफलता दर 93 प्रतिशत रही। यह विधि उन मरीजों के लिए विशेष रूप से उपयोगी है जिनमें परंपरागत जांचों से बीमारी का पता नहीं चल पाता, जैसे कि कम बैक्टीरियल लोड वाले रोगी।
डॉ. मृदु सिंह ने बताया कि यह तकनीक न केवल संभावित और निश्चित मेनिनजाइटिस के बीच स्पष्ट भेद कर सकती है, बल्कि कुछ मामलों में बैक्टीरिया की प्रजातियों की पहचान भी तेजी से कर सकती है, जिससे उपचार की दिशा शीघ्र निर्धारित करने में मदद मिलेगी और मृत्युदर कम होगी। वर्तमान में, ब्रेन टीबी का पता लगाने के लिए एमआरआइ, सीटी स्कैन और स्पाइनल टैप के बाद सेरेब्रोस्पाइनल फ्लूइड की जांच की जाती है, जिसमें समय लग सकता है।
ब्रेन टीबी के लक्षणों में सामान्य सिरदर्द, लंबे समय तक बुखार, उल्टी-मतली, गर्दन में अकड़न, भ्रम, दौरे पड़ना और शरीर के अंगों का सुन्न होना या कमजोर पड़ना शामिल हैं। इस नई तकनीक से इन लक्षणों वाले मरीजों के लिए बेहतर निदान और उपचार की उम्मीद बढ़ी है।
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