झारखंड में जैव विविधता संरक्षण को केंद्र से मिलेंगे 100 करोड़, बनेगा डिजिटल डाटाबेस
झारखंड अपनी समृद्ध जैव विविधता के संरक्षण और संवर्धन के लिए केंद्र सरकार से 100 करोड़ रुपये की महत्वपूर्ण वित्तीय सहायता प्राप्त करेगा। केंद्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्रालय द्वारा बनाई गई इस योजना के तहत, यह राशि चार चरणों में जारी की जाएगी, जिसका मुख्य उद्देश्य शोध कार्यों को गति देना, जैव विविधता स्थलों का संरक्षण करना और एक व्यापक डिजिटल डेटाबेस तैयार करना है।
राज्य के 15 जिलों में कुल 106 ऐसे महत्वपूर्ण जैव विविधता स्थलों की पहचान की गई है, जो प्राकृतिक रूप से जीव-जंतुओं के जीवन यापन के लिए अनुकूल वातावरण प्रदान करते हैं। रांची जिले में ऐसे चार स्थल चिन्हित किए गए हैं। इसके अतिरिक्त, सारंडा, पलामू टाइगर रिजर्व, दलमा और हजारीबाग जैसे वन क्षेत्रों को भी विशेष रूप से शोध की दृष्टि से महत्वपूर्ण माना गया है, जिसके लिए केंद्र सरकार ने यह पहल की है।
मंत्रालय के बायोडायवर्सिटी प्रकोष्ठ के सलाहकार विवेक चौधरी के अनुसार, झारखंड का प्राकृतिक परिवेश वन्यजीवों के लिए एक आदर्श आवास है। इस विविधता को डिजिटल रूप से रिकॉर्ड करके भविष्य की पीढ़ियों के लिए संरक्षित किया जाएगा। यह कदम न केवल वर्तमान पारिस्थितिक तंत्र की सुरक्षा सुनिश्चित करेगा, बल्कि भविष्य के शोधों के लिए एक मूल्यवान संसाधन भी साबित होगा।
रांची विश्वविद्यालय के भूगर्भशास्त्र के प्राध्यापक और पर्यावरणविद नीतीश प्रियदर्शी ने इस पहल का स्वागत करते हुए कहा कि राज्य के जंगलों में फ्लोरा और फोना (वनस्पतियां और जीव-जंतु) की बड़ी संख्या में मौजूदगी है, जिसमें पांच सौ से लेकर तीन हजार वर्ष तक पुराने प्राचीन वृक्ष भी शामिल हैं। उन्होंने चिंता व्यक्त की कि अवैध कटाई और निर्माण कार्यों से इन अनमोल प्राकृतिक धरोहरों को नुकसान पहुंचा है। केंद्र सरकार के प्रयासों से इन प्राचीन वृक्षों और वन्यजीवों का संरक्षण संभव हो सकेगा। इन पर गहन शोध कार्य से कई वैज्ञानिक रहस्यों से भी पर्दा उठने की उम्मीद है।
झारखंड के जंगलों की विशेषता साल, गम्हार, महुआ, कटहल जैसे विशाल वृक्षों के साथ-साथ करमी, कोयनार जैसी सागौन की प्रजातियां, बांस की झाड़ियां और शतावर जैसी औषधीय वनस्पतियां हैं। विवेक चौधरी के अनुसार, इन वनस्पतियों की उत्पादन प्रक्रियाओं की जानकारी को संरक्षित करना भी आवश्यक है। इसके अलावा, यहां एक ही जंगल में हाथी, बाघ और चीतल जैसे विविध वन्यजीवों का एक साथ पाया जाना इसकी विशिष्टता को दर्शाता है। इस पहल के माध्यम से इन प्रजातियों के पुनर्वास और उनके संरक्षण को भी बल मिलेगा।
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