वैश्विक मंच पर बढ़ा भारत का कद, ‘India election system’ बना दुनिया के लिए प्रेरणास्रोत
भारतीय चुनाव प्रणाली को वैश्विक मंच पर एक महत्वपूर्ण पहचान मिली है। हाल ही में भारत को इंटरनेशनल इंस्टीट्यूट फॉर डेमोक्रेटिक एंड इलेक्टोरल असिस्टेंस (IDEA) की अध्यक्षता मिली है। यह संगठन दुनिया के दो अरब से अधिक पंजीकृत मतदाताओं का प्रतिनिधित्व करता है, जिसमें अकेले भारत की हिस्सेदारी 99 करोड़ 10 लाख से अधिक है। इस वैश्विक मान्यता ने भारत के लोकतांत्रिक मॉडल को पश्चिमी देशों के समक्ष एक मजबूत विकल्प के रूप में प्रस्तुत किया है।
पश्चिमी देशों में लोकतंत्र की अवधारणा 1215 ईस्वी के मैग्नाकार्टा संधि से जुड़ी है, जिसके कारण उनमें एक खास तरह का श्रेष्ठताबोध है। ऐसे में IDEA की अध्यक्षता मिलना भारत के लिए केवल औपचारिक जिम्मेदारी नहीं, बल्कि वैचारिक नेतृत्व का अवसर है। यह दिखाता है कि भारत की चुनावी प्रणाली की वैश्विक स्वीकार्यता बढ़ रही है, भले ही घरेलू मोर्चे पर कुछ सवाल उठते रहे हों।
भारत में मतदाताओं की भागीदारी लगातार बढ़ रही है, जो चुनाव आयोग के नवाचारों की सफलता को दर्शाती है। चुनावी प्रबंधन में डिजिटल तकनीक का उपयोग, दिव्यांगों और दूरस्थ क्षेत्रों के मतदाताओं तक पहुंच बढ़ाना, ईवीएम और वीवीपैट का उपयोग, तथा थीम आधारित मतदान केंद्र जैसी पहलें तेजी से लागू की जा रही हैं। इन प्रयासों से चुनावी साक्षरता बढ़ी है और लोगों का भरोसा कायम रहा है।
भारतीय लोकतंत्र की जड़ें केवल आधुनिक चुनाव प्रक्रिया में नहीं हैं, बल्कि इसका आधार भारत के पारंपरिक लोकतांत्रिक सोच में भी है। दक्षिण भारत में दसवीं सदी के चोल शासकों की ग्रामीण शासन व्यवस्था और संत बसवेश्वर द्वारा स्थापित अनुभव मंडपम (जिसे आधुनिक संसद का प्रारंभिक रूप माना जाता है) इसके उदाहरण हैं। यह भारतीय मॉडल पश्चिमी लोकतंत्रों से अधिक स्थिर और प्रेरक दिखाई देता है।
आज दुनिया में ध्रुवीकरण, दुष्प्रचार, साइबर हस्तक्षेप और चुनावों में काले धन का बढ़ता उपयोग जैसी चुनौतियां हैं। जनमत को प्रभावित करने के लिए एआई का बढ़ता इस्तेमाल भी एक गंभीर खतरा है। ऐसे चुनौतीपूर्ण माहौल में, भारत का सफल चुनावी मॉडल वैश्विक मंच पर लोकतांत्रिक देशों की चुनाव प्रणालियों के लिए आशा की किरण बन सकता है। भारत की बहुलतावादी समाज, भाषा और धर्म की विविधता इसकी कमजोरी नहीं, बल्कि सबसे बड़ी ताकत है।
