हापुड़ में गंगा तट पर कार्तिक मेला: महाभारत से विभाजन तक, एक अनूठी परंपरा की बदलती तस्वीर
उत्तर प्रदेश के हापुड़ जिले में गढ़मुक्तेश्वर स्थित गंगा तट पर प्रतिवर्ष लगने वाला कार्तिक पूर्णिमा मेला केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि यह सदियों पुरानी परंपराओं, सामाजिक ताने-बाने और ऐतिहासिक घटनाओं का जीवंत प्रतीक है। मोक्षदायिनी गंगा के किनारे लगने वाले इस मेले का इतिहास महाभारत काल से जुड़ा माना जाता है, जो इसे एक विशेष महत्व प्रदान करता है।
कभी यह मेला सामाजिक और राजनीतिक गतिविधियों का एक प्रमुख केंद्र हुआ करता था। लोग यहां न केवल धार्मिक अनुष्ठान करने आते थे, बल्कि एक-दूसरे के खान-पान और पहनावे से परिचित होते थे, और अपने बेटे-बेटियों के विवाह तक तय करते थे। लगभग सात दशक पहले, जब प्रचार-प्रसार के साधन सीमित थे, यह धार्मिक मेला एक बड़ा राजनीतिक मंच भी बन गया था। पूर्व प्रधानमंत्री चौधरी चरण सिंह जैसे दिग्गज नेता यहां जनसभाओं को संबोधित कर अपनी नीतियां प्रस्तुत करते थे, जिससे यह आम जनता से जुड़ने का एक महत्वपूर्ण माध्यम बन गया था।
हालांकि, भक्ति और उल्लास से सराबोर यह मेला कई ऐतिहासिक उथल-पुथल का गवाह भी रहा है। देश के विभाजन के दौरान, 1947 में, गढ़ गंगा मेला सांप्रदायिक दंगों की भयावह आग में झुलस गया था। उस समय मेले में देश की सबसे बड़ी लकड़ी की मंडी लगती थी, जहां किसान बैलगाड़ियों समेत कृषि संबंधी सामान खरीदते थे। दंगों के दौरान, लकड़ी मंडी के व्यापारियों को सबसे अधिक जान-माल का नुकसान उठाना पड़ा था।
प्राचीन गंगा मंदिर के कुल पुरोहित पंडित संतोष कौशिक बताते हैं कि देश के बंटवारे के दौरान गढ़ खादर मेला भी सांप्रदायिकता की आग में जल उठा था, जिसकी लपटें मेले से शहर तक फैल गई थीं। इस त्रासदी के बीच, मानवीयता की एक अद्भुत मिसाल भी देखने को मिली। बहुसंख्यक हिंदू समुदाय ने अपने मुस्लिम परिचितों को अपने घरों में छिपाकर उनकी जान बचाई थी, जो सांप्रदायिक सद्भाव और भाईचारे का एक प्रेरणादायक उदाहरण है।
आधुनिक परिवेश में, इस मेले की परंपराएं और स्वरूप तेजी से बदल रहे हैं। भले ही आज इसकी राजनीतिक और सामाजिक भूमिका उतनी प्रमुख न हो, लेकिन गंगा के प्रति अटूट आस्था और श्रद्धालुओं का उत्साह आज भी बरकरार है। यह मेला अतीत के गौरव, संघर्ष और सद्भाव की कहानियों को समेटे हुए, हर साल एक नई पीढ़ी को अपनी प्राचीन विरासत से जोड़ता रहता है।
