1971 युद्ध की गौरवगाथा: पाइन डिव ने जेसोर फतह कर पाकिस्तान को चटाई धूल, 94 हजार सैनिकों ने किया था आत्मसमर्पण
पूर्वी पाकिस्तान (वर्तमान बांग्लादेश) में पाकिस्तानी सेना के अत्याचार से कराह रही जनता को मुक्ति दिलाने के उद्देश्य से भारत ने 1971 में निर्णायक कदम उठाया। आपरेशन कैक्टस लिलि में महज 13 दिन में भारतीय फौज ने दुश्मन को परास्त कर ऐतिहासिक विजय हासिल की। ढाका पर कब्जे के साथ ही 94 हजार पाकिस्तानी सैनिकों व अधिकारियों ने हथियार डाल दिए। युद्ध इतिहास में इतनी बड़ी संख्या में आत्मसमर्पण का यह पहला उदाहरण था। 16 दिसंबर को प्रतिवर्ष विजय दिवस मनाकर देश उस गौरवशाली क्षण को नमन करता है। इस अद्भुत विजय के यज्ञ में मेरठ की भूमिका भी स्वर्णाक्षरों में अंकित है। यहां के वीर सपूतों ने न केवल रणभूमि में मोर्चा संभाला, बल्कि चार हजार से अधिक पाक युद्धबंदियों को भी मेरठ छावनी के विभिन्न कैंपों में रखा गया।
भारत के विजय तिलक में पाइन डिवीजन ने जेसोर फतह का टीका लगाया था। उसी विजय पर हर वर्ष पाइन डिवीजन में सात दिसंबर को जेसोर दिवस मनाया जाता है। पाइन डिवीजन के जनरल आफिसर कमांडिंग मेजर जनरल प्रणय डंगवाल ने बलिदानियों को पुष्पचक्र चढ़ाकर नमन किया। कार्यक्रम में पाइन डिवीजन के साथ ही युद्ध में शामिल 32वीं ब्रिगेड के अधिकारी और जवानों ने भी अपने पूर्वजों के बलिदान को श्रद्धासुमन अर्पित किया।
पूर्वी पाकिस्तान में पाकिस्तानी फौज का अभेद गढ़ माने जाने वाले जेसोर और खुलना को भेदने का श्रेय मेरठ छावनी स्थित पाइन डिवीजन को जाता है। पाकिस्तानी सेनाध्यक्ष लेफ्टिनेंट जनरल नियाजी ने इस क्षेत्र की रक्षा मेजर जनरल अंसारी के अधीन 9 इन्फेंट्री डिवीजन को सौंपी थी। भारतीय सेना के टू कोर कमांडर लेफ्टिनेंट जनरल रैना ने मधुमति नदी के पश्चिमी क्षेत्र को जीतने के लिए दो डिवीजनों को आगे बढ़ाने की रणनीति बनाई। पाइन डिवीजन, मेजर जनरल दलबीर सिंह के नेतृत्व में और 4 माउंटेन डिवीजन मेजर जनरल एमएस ब्रार के नेतृत्व में दुश्मन किले को ढहाने निकली।
चार दिसंबर की सुबह ब्रिगेडियर जेएस घराया की 42 इन्फेंट्री ब्रिगेड ने बायरा मार्ग से प्रवेश कर पाकिस्तानी 107 ब्रिगेड को प्रथम आघात में ही अफ्रा–झिंगरगाछा तक पीछे धकेल दिया। कड़े प्रतिरोध के बाद ब्रिगेडियर तिवारी की 32 ब्रिगेड को लगाते ही मोर्चा पलट गया। छह दिसंबर सुबह 10 बजे भारतीय सेना ने सुरक्षा घेरा तोड़ दिया। 2 सिख, 7 पंजाब मेकनाइज्ड बटालियन और 63 कैवेलरी स्क्वाड्रन के सहयोग से भारतीय सेना चौगाछा–जेसोर रोड तक पहुंच गई। सात दिसंबर की सुबह 7 पंजाब ने जेसोर एयरफील्ड पर विजय ध्वज फहरा दिया। भारतीय प्रगति से भयभीत मेजर जनरल अंसारी जेसोर छोड़कर भाग निकले।
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