दिल्ली ब्लास्ट: पाकिस्तान से कोडनेम ‘उकासा’, ‘फैजान’ से होती थी बात, ‘व्हाइट-कॉलर’ टेरर मॉड्यूल का खुलासा
दिल्ली के लाल किले के पास हुए विस्फोट की जांच में एक बड़े ‘व्हाइट-कॉलर’ टेरर मॉड्यूल का खुलासा हुआ है। गिरफ्तार किए गए डॉक्टरों ने पाकिस्तानी हैंडलरों के साथ संवाद करने के लिए ‘घोस्ट’ सिम कार्ड और एन्क्रिप्टेड मैसेजिंग ऐप्स जैसे व्हाट्सऐप और टेलीग्राम का इस्तेमाल किया। यह खुलासा तब हुआ जब दूरसंचार विभाग ने ऐप-आधारित संचार सेवाओं को फिजिकल सिम से जोड़ने का आदेश दिया।
जांच में सामने आया कि आरोपी डॉक्टरों और अन्य सहयोगियों ने सुरक्षा एजेंसियों से बचने के लिए ‘डुअल-फोन’ रणनीति अपनाई थी। प्रत्येक आरोपी के पास दो से तीन मोबाइल हैंडसेट होते थे। एक फोन उनके व्यक्तिगत उपयोग के लिए होता था, जबकि दूसरा ‘टेरर फोन’ विशेष रूप से पाकिस्तानी हैंडलरों के साथ व्हाट्सऐप और टेलीग्राम पर बातचीत के लिए आरक्षित था। इन संपर्कों में ‘उकासा’, ‘फैजान’ और ‘हाशमी’ जैसे कोडनेम का इस्तेमाल किया जाता था।
इन द्वितीयक उपकरणों के सिम कार्ड्स अनजान व्यक्तियों के आधार कार्ड का उपयोग करके जारी किए गए थे। जम्मू-कश्मीर पुलिस ने फर्जी आधार कार्ड के आधार पर सिम जारी करने वाले एक रैकेट का भी भंडाफोड़ किया है। गिरफ्तार आरोपियों में उमर-उन-नबी भी शामिल था, जो विस्फोटक से लदे वाहन के साथ मारा गया था। हैंडलरों ने ऐप्स की उस सुविधा का लाभ उठाया जो फिजिकल सिम के बिना भी मैसेजिंग जारी रखने की अनुमति देती है, जिससे वे पाकिस्तान या पीओके से मॉड्यूल को यूट्यूब के माध्यम से आईईडी बनाने का प्रशिक्षण दे सकें और भारत में हमले की योजना बना सकें।
इन सुरक्षा कमजोरियों को दूर करने के लिए, केंद्र सरकार ने दूरसंचार अधिनियम 2023 और टेलीकॉम साइबर सिक्योरिटी रूल्स लागू किए हैं। 28 नवंबर 2025 के दिशानिर्देश के अनुसार, सभी टेलीकम्यूनिकेशन आइडेंटिफायर यूजर एंटिटीज को 90 दिनों के भीतर यह सुनिश्चित करना होगा कि उनके ऐप्स केवल सक्रिय सिम वाले डिवाइस पर ही काम करें। नियमों का पालन न करने पर सख्त कार्रवाई की जाएगी। इस कदम को आतंकवादी नेटवर्क के डिजिटल बुनियादी ढांचे को कमजोर करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण प्रयास माना जा रहा है।
