भाजपा की ‘दलित संवाद’ रणनीति: 2027 UP Elections के लिए घर-घर पहुंचेगी पार्टी
उत्तर प्रदेश में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने 2027 के विधानसभा चुनावों में अपनी सत्ता बरकरार रखने के लिए दलित वोटरों को साधने की रणनीति तेज कर दी है। 2024 के लोकसभा चुनावों में दलित मतदाताओं के विपक्षी दलों की ओर जाने के बाद, पार्टी ने नए सिरे से सामाजिक समीकरणों को साधने पर ध्यान केंद्रित किया है। इस कवायद का मुख्य उद्देश्य दलित समाज के महापुरुषों की विरासत और उनके अनुयायियों से निरंतर संवाद स्थापित करना है।
भाजपा ने कांशीराम, संत रविदास, संत गाडगे, डॉ. भीमराव अंबेडकर, ज्योतिबा फुले, सावित्रीबाई फुले, उदा देवी, झलकारी बाई, वीरा पासी, लखन पासी, रमाबाई अंबेडकर और अहिल्याबाई होल्कर सहित लगभग 15 दलित और वंचित समाज के महापुरुषों का एक वार्षिक कैलेंडर तैयार किया है। इन महापुरुषों की जयंती और पुण्यतिथि पर प्रदेश भर में कार्यक्रमों की एक श्रृंखला आयोजित की जाएगी। इन आयोजनों के माध्यम से भाजपा का लक्ष्य दलित समाज के लोगों से बार-बार मिलना और उनसे बातचीत करना है, ताकि उन्हें फिर से पार्टी के पाले में लाया जा सके। यह रणनीति आगामी UP Elections में भाजपा के लिए महत्वपूर्ण साबित हो सकती है।
2024 के लोकसभा चुनावों में भाजपा की सीटें 62 से घटकर 33 रह गई थीं, और आरक्षित सीटों पर उसका प्रदर्शन विशेष रूप से कमजोर रहा था। जहां 2014 और 2019 के लोकसभा चुनावों में भाजपा का प्रदर्शन आरक्षित सीटों पर बेहतर था, वहीं 2024 में समाजवादी पार्टी (सपा) ने सात आरक्षित सीटें जीतीं, जबकि भाजपा को आठ और कांग्रेस व आजाद समाज पार्टी को एक-एक सीट मिली। दलित वोटरों का यह बड़ा छिटकाव 2024 में स्पष्ट दिखा, हालांकि इससे पहले भी मामूली तौर पर दलित वोटर भाजपा से अलग होते दिख रहे थे। विधानसभा की कुल 403 सीटों में से 86 आरक्षित हैं, जिनमें 84 अनुसूचित जाति और 2 अनुसूचित जनजाति के लिए हैं। 2017 में भाजपा ने 71 आरक्षित सीटें जीती थीं, जो 2022 में घटकर 60 रह गईं, जबकि इसी दौरान सपा की आरक्षित सीटों पर जीत 7 से बढ़कर 16 हो गई थी।
पिछले एक दशक में बहुजन समाज पार्टी (बसपा) भले ही राजनीतिक हाशिये पर हो, लेकिन बसपा प्रमुख मायावती की अपील उनके पारंपरिक वोटरों में अब भी प्रभावी मानी जाती है। इसी कारण, भाजपा एक तरफ दलितों को पार्टी में लाने की रणनीति पर काम कर रही है, वहीं दूसरी ओर वह मायावती के प्रति नरम रुख अपना रही है। सपा और कांग्रेस पर तीखे हमले के बावजूद, भाजपा मायावती पर सीधे तौर पर हमला करने से बचती रही है, ताकि मायावती के प्रति आस्था रखने वाले वोटरों में किसी भी तरह की नाराजगी न आए। भाजपा बसपा की सक्रियता में आई कमी से दलित राजनीति में आए खालीपन को सहजता से भरने की नीति पर आगे बढ़ना चाह रही है, जिसका सीधा असर राज्य की राजनीतिक दिशा पर पड़ेगा।
