कानपुर पुलिस की बड़ी चूक: हार्ट अटैक को समझा कत्ल, 5 बेगुनाह 3 साल तक झेलते रहे हत्या का दाग
कानपुर पुलिस की एक गंभीर चूक में पांच निर्दोष व्यक्ति तीन साल तक हत्या के झूठे आरोप में जेल में रहे। पुलिस ने एक व्यक्ति की हार्ट अटैक से हुई मौत को हत्या का मामला मानकर इन पांचों के खिलाफ चार्जशीट दाखिल कर दी थी। हालांकि, कोर्ट में बचाव पक्ष ने यह साबित कर दिया कि मृतक की मौत हार्ट अटैक से हुई थी, न कि हत्या से। इसके बाद अदालत ने सभी पांचों आरोपियों को साक्ष्य के अभाव में बरी कर दिया। इनमें से तीन आरोपी हाल ही में जेल से रिहा हुए हैं, जबकि दो पहले से ही जमानत पर थे।
यह मामला बाबूपुरवा के ट्रांसपोर्ट भवन से जुड़ा है, जहां चौकीदार जितेंद्र उर्फ भाटे और पल्लेदार अशोक व इम्तियाज काम करते थे। मुंशीपुरवा का संतोष उर्फ कलाकार भी मजदूरी करता था और परिवार से विवाद के बाद ट्रांसपोर्ट भवन में रहने लगा था। 31 अगस्त 2023 की सुबह संतोष का शव लॉन में मिला। पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट में एक आंख पर चोट का जिक्र था, जिसके आधार पर मृतक के भांजे नीरज ने जितेंद्र और अशोक पर हत्या का शक जताते हुए तहरीर दी।
जांच के दौरान इंस्पेक्टर अनूप सिंह ने जितेंद्र उर्फ भाटे, अशोक कुमार, इम्तियाज उर्फ छुछ्छी, लालू उर्फ लाल सिंह और मिथुन को हत्या का दोषी मानते हुए जेल भेज दिया। उन पर लाठी से पीटकर हत्या करने और शव को नीचे फेंकने का आरोप था। अधिवक्ता राजेश्वर तिवारी ने बताया कि पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट में मौत की वजह स्पष्ट नहीं थी, इसलिए बिसरा और हार्ट को सुरक्षित रखा गया था, लेकिन हार्ट की जांच के लिए नहीं भेजा गया। मृतक का चेहरा नीला पड़ गया था, जो हार्ट अटैक का संकेत हो सकता है।
कोर्ट में सुनवाई के दौरान कोई चश्मदीद गवाह नहीं मिला और न ही आरोपियों के आने-जाने के सीसीटीवी फुटेज मिले। एक गवाह ने इम्तियाज को ट्रांसपोर्ट भवन में जाते देखा था, लेकिन उसके बाद वह भी सो गया। हत्या की वजह भी स्पष्ट नहीं हो पाई। इन सब कारणों से कोर्ट ने पांचों आरोपियों को बरी करने का फैसला सुनाया।
अधिवक्ता तिवारी ने बताया कि तीन आरोपी मजदूरी करने वाले थे, इसलिए उनका केस लीगल एड डिफेंस काउंसिल को सौंपा गया था। अपर जिला एवं सत्र न्यायाधीश सपना त्रिपाठी ने जितेंद्र, अशोक, इम्तियाज, लालू और मिथुन को बरी कर दिया। जेल में बंद तीन आरोपियों को रिहा कर दिया गया, जबकि दो पहले से जमानत पर थे। सभी से 20-20 हजार रुपये की जमानतें मांगी गई हैं, जिन्हें दाखिल करने के लिए एक सप्ताह का समय दिया गया है।
यह मामला पुलिस की जांच में हुई लापरवाही को उजागर करता है। हार्ट को सुरक्षित रखने के बावजूद उसकी फोरेंसिक जांच न कराना और हार्ट अटैक की आशंका को नजरअंदाज करना, इन पांचों निर्दोषों को तीन साल तक जेल में रहने पर मजबूर कर गया। बचाव पक्ष की दलीलों और कोर्ट में साक्ष्य के अभाव के कारण ही आरोपियों को न्याय मिल सका।
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