इलाहाबाद High Court का बड़ा फैसला: मजिस्ट्रेट चार्जशीट की धाराओं में बदलाव नहीं कर सकते
इलाहाबाद हाई कोर्ट ने एक छेड़छाड़ के मामले में समन आदेश को रद्द करने की मांग वाली याचिका को खारिज करते हुए आपराधिक न्याय प्रणाली के संबंध में एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। कोर्ट ने साफ किया कि मजिस्ट्रेट संज्ञान लेते समय चार्जशीट में दर्ज धाराओं में बदलाव नहीं कर सकते। कोर्ट ने कहा कि धाराओं को जोड़ने या घटाने की प्रक्रिया केवल आरोप तय करने के स्तर पर ही की जा सकती है।
न्यायमूर्ति प्रवीण कुमार गिरि की पीठ ने यह फैसला सुनाया। कोर्ट ने कहा कि संज्ञान आदेश को रद्द करना वास्तव में आरोपित को समय से पहले आरोप मुक्त करने जैसा है। पीठ ने उल्लेख किया कि किसी भी धारा को जोड़ना, घटाना, बाहर करना या शामिल करना आरोप में परिवर्तन के समान है।
यह मामला मिर्ज़ापुर के सिविल जज जूनियर डिवीजन (फास्ट ट्रैक कोर्ट/महिला अपराध) के 28 मई 2024 के समन आदेश को चुनौती देने से जुड़ा था। याचिकाकर्ताओं ने तर्क दिया था कि पीड़िता ने पुलिस और मजिस्ट्रेट के सामने दर्ज अपने बयानों में एफआईआर के तथ्यों का समर्थन नहीं किया है। उन्होंने यह भी दलील दी कि यह मामला प्रतिशोध का है क्योंकि एफआईआर दर्ज होने से पहले ही विभाग द्वारा पीड़िता के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्यवाही शुरू की गई थी।
कोर्ट ने आरोपों के परिवर्तन और ट्रायल के चरणों के संबंध में प्रक्रियात्मक कानून की जांच के बाद पाया कि मजिस्ट्रेट का धाराओं को शामिल करने या बाहर करने का अधिकार आरोप तय करते समय उत्पन्न होता है, न कि संज्ञान लेते समय।
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