बिहार में पराली जलाना प्रतिबंधित, नियम तोड़ने पर सरकारी योजनाओं से होगी वंचित
बिहार सरकार ने पर्यावरण की सुरक्षा और वायु प्रदूषण को नियंत्रित करने के उद्देश्य से खेतों में पराली जलाने पर कड़ा कदम उठाते हुए पूर्ण प्रतिबंध लगा दिया है। इस संबंध में जारी किए गए नए नियमों के अनुसार, यदि कोई किसान अपने खेतों में फसल अवशेष जलाते हुए पाया जाता है, तो उसे सरकारी योजनाओं के लाभ से वंचित कर दिया जाएगा।
सूत्रों के अनुसार, जिला कृषि पदाधिकारी प्रभात कुमार ने बताया कि नियमों का उल्लंघन करने वाले किसानों का किसान पंजीकरण ब्लॉक कर दिया जाएगा। इसके अतिरिक्त, भारतीय दंड संहिता (BNS) की धारा 152 के तहत भी कानूनी कार्रवाई की जाएगी। उन्होंने जोर देकर कहा कि पराली जलाने से न केवल खेत की उर्वरा शक्ति का ह्रास होता है, बल्कि पर्यावरण को भी भारी क्षति पहुँचती है।
सरकार किसानों को पराली प्रबंधन के प्रति जागरूक करने के लिए पंचायत स्तर से लेकर जिला स्तर तक प्रचार-प्रसार का कार्य कर रही है। किसानों को प्रोत्साहित किया जा रहा है कि वे पुआल को जलाने के बजाय उसका प्रबंधन करें। इसके लिए सरकार विभिन्न प्रकार के उपयोगी कृषि यंत्रों पर 40 से 70 प्रतिशत तक अनुदान भी उपलब्ध करा रही है। इन यंत्रों में स्ट्रा बेलर, सुपर-हैप्पी सीडर, जीरो टिल सीड-कम फर्टिलाईजर ड्रिल, रीपर कम वाइंड, स्ट्रा रीपर, रोटरी मल्चर और स्ट्रा मैनेजमेंट सिस्टम (एसएमएस) यंत्र शामिल हैं।
जिला कृषि पदाधिकारी ने पुआल न जलाने के फायदों पर प्रकाश डालते हुए बताया कि एक टन पुआल को मिट्टी में मिलाने से मिट्टी को अत्यधिक मात्रा में पोषक तत्व मिलते हैं। इसमें 20 से 30 किलोग्राम नाइट्रोजन, 60 से 100 किलोग्राम पोटाश, 5 से 7 किलोग्राम सल्फर और 600 मिलीग्राम आर्गेनिक कार्बन जैसे महत्वपूर्ण पोषक तत्व प्राप्त होते हैं।
इसके विपरीत, एक टन पुआल जलाने से वातावरण को गंभीर नुकसान होता है। इससे तीन किलोग्राम पार्टिकुलेट मैटर, 60 किलोग्राम कार्बन मोनोऑक्साइड, 1460 किलोग्राम कार्बन डाइऑक्साइड, 190 किलोग्राम राख और दो किलोग्राम सल्फर डाइऑक्साइड जैसे हानिकारक तत्व उत्सर्जित होते हैं। पराली जलाने से निकलने वाला धुआँ मानव स्वास्थ्य के लिए भी अत्यंत हानिकारक है, जिससे सांस लेने में तकलीफ, आँखों में जलन, नाक और गले में समस्याएँ सहित कई गंभीर स्वास्थ्य समस्याएँ उत्पन्न हो सकती हैं।
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