बिहार चुनाव के नतीजों के बाद इंडी गठबंधन में गहरी दरार, सहयोगी दल हुए नाराज
बिहार विधानसभा चुनावों में मिली करारी हार ने इंडी गठबंधन को अब तक के सबसे बड़े आंतरिक संकट में धकेल दिया है। गठबंधन के कई क्षेत्रीय सहयोगी दल न केवल कांग्रेस के नेतृत्व की रणनीति और प्रभावशीलता पर सवाल उठा रहे हैं, बल्कि गठबंधन की विश्वसनीयता पर भी गंभीर चिंता व्यक्त कर रहे हैं। यह स्थिति गठबंधन के भविष्य पर प्रश्नचिह्न लगा रही है।
गठबंधन में पहली बड़ी दरार चुनाव पूर्व ही तब उभरी जब झारखंड मुक्ति मोर्चा (झामुमो) बिहार में सीट-बंटवारे की रूपरेखा से बाहर हो गया। झामुमो ने आरोप लगाया कि वरिष्ठ सहयोगियों ने बातचीत में उन्हें दरकिनार किया और पूर्व में किए गए वादों को पूरा नहीं किया। पार्टी के नेताओं का कहना है कि क्षेत्रीय सहयोगियों के साथ कनिष्ठ सहयोगी जैसा व्यवहार किया जा रहा है, न कि समान हितधारक के रूप में। झामुमो अब झारखंड सहित अन्य राज्यों में भविष्य में गठबंधन में अपनी भागीदारी पर पुनर्विचार कर रहा है।
शिवसेना (यूबीटी) ने बिहार के नतीजों को विपक्ष के लिए एक गंभीर खतरे की घंटी करार दिया है। पार्टी के वरिष्ठ नेताओं ने न केवल चुनावी प्रबंधन पर, बल्कि इंडी ब्लॉक के आंतरिक समन्वय पर भी सवाल उठाए हैं। उन्होंने गठबंधन की कार्यप्रणाली पर असंतोष व्यक्त किया है।
इस बीच, समाजवादी पार्टी के एक विधायक ने तो यहां तक कहा है कि अखिलेश यादव को विपक्षी गठबंधन का नेतृत्व करना चाहिए। उन्होंने यह भी जोड़ा कि समाजवादी पार्टी उत्तर प्रदेश जैसे महत्वपूर्ण राज्य में अकेले दम पर सरकार बनाने में सक्षम है। पिछले आम चुनाव में 80 में से 37 सीटें जीतने वाली सपा, कांग्रेस के बाद लोकसभा में दूसरी सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी है।
इन परिस्थितियों में, सहयोगी दल एक दुविधा में हैं: क्या वे ऐसे गठबंधन में बने रहें जिसका नेतृत्व दबाव में है, या फिर अपनी राज्य-स्तरीय प्रासंगिकता को बनाए रखने के लिए एक स्वतंत्र रास्ता अपनाएं? बिहार के जनादेश ने इंडी गठबंधन में व्याप्त अस्थायी बेचैनी को एक पूर्ण पहचान संकट में बदल दिया है, और बदलाव की मांग अब और तेज हो गई है।
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