अब हर रसोई बनेगी मिनी फार्म, घर पर उगाएं पौष्टिक माइक्रोग्रीन्स
डाइनिंग टेबल पर रखी छोटी सी ट्रे में ताज़ी हरी पत्तियां लहरा रही हों और उन्हें सीधा अपनी थाली में सजाया जा सके, यह अब सपना नहीं रहा। भागलपुर के सबौर स्थित बिहार कृषि विश्वविद्यालय (बीएयू) के वैज्ञानिकों ने माइक्रोग्रीन्स उगाने की एक ऐसी अभिनव तकनीक विकसित की है, जो आपकी रसोई, बालकनी या छत को एक छोटे से खेत में बदल देगी। इस विधि से मात्र सात से दस दिनों में पौष्टिक हरी पत्तियां तैयार हो जाती हैं, जिन्हें सीधे भोजन में इस्तेमाल किया जा सकता है।nnइस तकनीक की सबसे खास बात यह है कि इसके लिए न तो मिट्टी की आवश्यकता होती है और न ही खाद की। बीजों को रात भर पानी में भिगोने के बाद, उन्हें साफ पानी से धोकर किसी ट्रे या टिश्यू पर फैला दिया जाता है। नियमित रूप से पानी देते रहने पर कुछ ही दिनों में दो से तीन इंच लंबे पौधे तैयार हो जाते हैं। यह कम मेहनत में अधिक पोषण प्राप्त करने का एक शानदार तरीका है।nnमाइक्रोग्रीन्स की सैकड़ों किस्में उगाई जा सकती हैं। इस विधि से ब्रोकली, पालक, गोभी, मूली, चुकंदर, शलजम जैसी सामान्य सब्जियों के साथ-साथ धनिया, तुलसी, लेमन बाम जैसी जड़ी-बूटियां भी आसानी से उगाई जा सकती हैं। इतना ही नहीं, मटर, चना, गेहूं, जौ, बीन्स और सूरजमुखी जैसे अनाज भी इस तकनीक से घर पर उगाए जा सकते हैं, जिससे विविधता के अनगिनत विकल्प उपलब्ध होते हैं।nnस्वास्थ्य के दृष्टिकोण से माइक्रोग्रीन्स अत्यंत लाभकारी हैं। पारंपरिक सब्जियों की तुलना में इनमें चार से चालीस गुना अधिक विटामिन, मिनरल्स और एंटीऑक्सीडेंट पाए जाते हैं। यह हृदय रोग, मधुमेह और कैंसर जैसी गंभीर बीमारियों के जोखिम को कम करने में सहायक माना जाता है। साथ ही, यह पाचन क्षमता को बढ़ाता है, त्वचा को स्वस्थ रखता है और प्रतिरक्षा प्रणाली को मजबूत करता है। यही कारण है कि यह बच्चों, बुजुर्गों और व्यस्त कामकाजी लोगों के लिए एक आदर्श भोजन विकल्प है।nnशहरी क्षेत्रों में, जहां जगह की कमी एक बड़ी चुनौती है, वहां यह तकनीक विशेष रूप से उपयोगी साबित हो रही है। टेबल, खिड़की के पास, बालकनी या छत जैसी छोटी जगहों पर भी इसे आसानी से उगाया जा सकता है। इस विधि में पानी की खपत कम होती है और कीटनाशकों के प्रयोग से पूरी तरह बचा जाता है। स्थानीय स्तर पर ताज़ी सब्जियों की उपलब्धता से परिवहन लागत और कार्बन उत्सर्जन में भी कमी आती है, जो इसे पर्यावरण के अनुकूल बनाता है।nnयह तकनीक न केवल पौष्टिक भोजन का स्रोत है, बल्कि आय का एक नया जरिया भी बन रही है। गृहणियां, युवा और छोटे किसान कम लागत में माइक्रोग्रीन्स का उत्पादन कर अच्छी कमाई कर रहे हैं। होटलों, जूस बारों और स्वास्थ्य-केंद्रित रेस्तरां में इसकी बढ़ती मांग इस क्षेत्र में उद्यमिता को बढ़ावा दे रही है।nnकृषि अनुसंधान संस्थान, मीठापुर, पटना में शहरी उपभोक्ताओं की जरूरतों को ध्यान में रखते हुए इस माइक्रोग्रीन्स उत्पादन तकनीक को विकसित किया गया है। सूत्रों के अनुसार, निदेशक डॉ. एस. एन. दास के नेतृत्व में वरिष्ठ सब्जी वैज्ञानिक डॉ. संगीता कुमारी, मृदा वैज्ञानिक डॉ. निखत यास्मीन और तकनीकी सहायक मधु कुमारी की टीम ने इस पर महत्वपूर्ण कार्य किया है। इस तकनीक का शुभारंभ पटना से किया जाएगा और जल्द ही इसे पूरे राज्य में विस्तारित करने की योजना है।”
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