गृह विभाग छोड़ा नीतीश ने, सत्ता संतुलन का नया फार्मूला
बिहार की नई एनडीए सरकार में विभागों का बंटवारा सिर्फ प्रशासनिक पुनर्संरचना नहीं, बल्कि सत्ता-संतुलन का एक नया राजनीतिक फार्मूला भी साबित हो रहा है। 20 साल तक गृह विभाग को अपने पास रखने वाले मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने इस बार इसे डिप्टी सीएम सम्राट चौधरी को सौंपकर राजनीतिक संदेश दिया है कि नई सरकार में वे साझेदारी की नई परिभाषा लिखना चाहते हैं।
बिहार में 53 साल बाद पहली बार किसी गैर-कांग्रेसी सरकार में गृह विभाग मुख्यमंत्री के पास नहीं है। ऐसे में यह फैसला सिर्फ विभागीय अदला-बदली नहीं, बल्कि नीतीश की राजनीतिक शैली में बड़ा बदलाव माना जा रहा है। गृह विभाग राज्य के ताकतवर मंत्रालयों में गिना जाता है, जहां डीजीपी से लेकर एसपी तक की सीधी कमान होती है। इसे छोड़कर नीतीश ने दिखाया है कि वे गठबंधन की इस नई पारी में सत्ता का केंद्रीय नियंत्रण साथी दलों के साथ साझा करने को तैयार हैं। सबसे बड़ी बात, सम्राट चौधरी को यह जिम्मेदारी सौंपना भाजपा नेतृत्व को स्पष्ट संदेश है कि गठबंधन में उनकी भूमिका ‘सिर्फ सहयोगी’ से आगे बढ़ चुकी है।
दूसरी ओर, जदयू ने भाजपा के हाथ से वित्त और वाणिज्य कर मंत्रालय लेकर अपने वरिष्ठ मंत्री बिजेंद्र यादव को दिया है। वित्त, जो विकास योजनाओं, बजट प्रबंधन और संसाधन आवंटन का मूल है, उसका जदयू के पास जाना दर्शाता है कि नीतीश ने प्रशासनिक स्थिरता का नियंत्रण अभी भी अपनी पार्टी के ही अनुभवी कंधों पर रखा है। एक ओर गृह विभाग भाजपा को, और दूसरी ओर वित्त जदयू को, यह संतुलन स्पष्ट करता है कि नीतीश ने राजनीतिक और प्रशासनिक दोनों मोर्चों पर संतुलन का नया फॉर्मूला लागू किया है।
दिलचस्प यह भी है कि भाजपा के पास मंत्रियों की संख्या तो ज्यादा है, लेकिन जदयू के पास विभागों का बजट लगभग 1.30 लाख करोड़ अधिक है। इसका अर्थ यह है कि संख्या से अधिक महत्व विभागीय प्रभाव और बजट से तय होगा। जदयू के सिर्फ 8 मंत्रियों के पास 2.19 लाख करोड़ के विभाग हैं, जबकि भाजपा के 16 मंत्रियों के पास 89 हजार करोड़ के विभाग। यानी कम मंत्री, लेकिन ज्यादा आर्थिक शक्ति—यह भी एक खास रणनीतिक सेटिंग का संकेत है, जो भविष्य में सरकार के कामकाज को प्रभावित कर सकता है।
