एफेरेसिस मशीन ‘खून’ चूस रही: ड्रग विभाग की सुस्ती से मरीजों को नहीं मिल रहा लाभ
बरेली जिला अस्पताल में लाखों की लागत से मंगवाई गई एफेरेसिस मशीन का संचालन शुरू नहीं हो सका है। स्वास्थ्य विभाग ने इस मशीन को जरूरतमंद मरीजों के लिए एक साल पहले ही स्थापित कर दिया था, लेकिन लाइसेंस की प्रक्रिया अधूरी होने के कारण यह अभी तक चालू नहीं हो पाई है। इस मशीन की खासियत यह है कि यह एक डोनर से सीधे 40 से 50 हजार प्लेटलेट्स निकाल सकती है, जो पारंपरिक तरीके से निकाले जाने वाले 7 से 10 हजार प्लेटलेट्स की तुलना में पांच गुना अधिक है। इससे न केवल प्लेटलेट्स की कमी को तेजी से पूरा किया जा सकता है, बल्कि स्टॉक करने और खराब होने की समस्या से भी निजात मिलेगी।
स्वास्थ्य विभाग के अधिकारियों की ओर से इस मशीन को चालू कराने के लिए केंद्र, राज्य और स्थानीय ड्रग विभाग की संयुक्त टीम द्वारा सर्वे कराए जाने हेतु कई बार रिमाइंडर भेजे जा चुके हैं। सूत्रों के अनुसार, इस मशीन को संचालित करने के लिए शासन से लाइसेंस जारी होना है, जिसके लिए ड्रग विभाग की टीम का सर्वे करना अनिवार्य है। लेकिन, विभाग की उदासीनता के चलते यह सर्वे अब तक नहीं हो पाया है।
वर्तमान में, जिला अस्पताल के ब्लड बैंक में डोनर के खून से प्लेटलेट्स निकालने की प्रक्रिया लंबी और कम प्रभावी है। इससे निकाले गए प्लेटलेट्स को चार से पांच दिनों के भीतर इस्तेमाल करना होता है, अन्यथा वे खराब हो जाते हैं। इस कारण हर साल काफी मात्रा में प्लेटलेट्स बर्बाद हो जाती हैं। एफेरेसिस मशीन के आने से यह समस्या पूरी तरह समाप्त हो जाती, क्योंकि इससे सीधे अधिक मात्रा में प्लेटलेट्स निकाली जा सकती हैं और स्टॉक की आवश्यकता भी कम हो जाती।
इस मशीन की अनुपलब्धता के कारण डेंगू, मलेरिया या अन्य किसी संक्रमण से पीड़ित मरीजों के तीमारदारों को प्लेटलेट्स की व्यवस्था करने में काफी परेशानी का सामना करना पड़ रहा है। खासकर तब, जब प्लेटलेट्स काउंट तेजी से गिरता है और तत्काल आवश्यकता होती है। स्वास्थ्य विभाग इस वर्ष डेंगू के मामलों में कमी से कुछ राहत में रहा, लेकिन वायरल बुखार और अन्य बीमारियों में प्लेटलेट्स की कमी एक आम समस्या बनी रहती है। मशीन के चालू न होने से मरीजों को इस आधुनिक सुविधा का लाभ नहीं मिल पा रहा है, जो स्वास्थ्य विभाग की कार्यशैली पर सवाल खड़े करता है।
