भागलपुर में 25 हजार से अधिक वोटरों ने दबाया नोटा का बटन, मजबूत संदेश
भागलपुर जिले की हालिया विधानसभा चुनावों में, जहां एक ओर एनडीए ने सातों सीटों पर शानदार जीत दर्ज करते हुए अपना दबदबा कायम किया, वहीं दूसरी ओर ‘इनमें से कोई नहीं’ (नोटा) के विकल्प ने भी अपनी मजबूत उपस्थिति दर्ज कराई है। जिले में कुल 25,267 मतदाताओं ने किसी भी उम्मीदवार को पसंद न करते हुए नोटा का बटन दबाया, जो राजनीतिक दलों के लिए एक स्पष्ट संदेश है।
इस बार नोटा का यह आंकड़ा 2020 के विधानसभा चुनावों की तुलना में लगभग 7,800 अधिक है। 2020 में 16,752 मतदाताओं ने नोटा को चुना था। हालांकि, 2015 में जब पहली बार नोटा का विकल्प लागू किया गया था, तब यह संख्या 33,067 थी। यह दर्शाता है कि मतदाताओं का एक वर्ग लगातार नोटा को अपनी असंतुष्टि और अभिव्यक्ति के एक महत्वपूर्ण माध्यम के रूप में देख रहा है। कुल 15 लाख 13 हजार 889 मतदाताओं ने इन चुनावों में अपने मताधिकार का प्रयोग किया था, जिसमें नोटा का यह योगदान उल्लेखनीय है।
विधानसभा क्षेत्रवार आंकड़ों पर गौर करें तो, नाथनगर विधानसभा क्षेत्र में सर्वाधिक 5,203 मतदाताओं ने नोटा का बटन दबाया, जबकि भागलपुर विधानसभा क्षेत्र में सबसे कम 1,974 मतदाताओं ने इस विकल्प को चुना। यह प्रवृत्ति दर्शाती है कि मतदाता अब केवल मतदान करने तक ही सीमित नहीं हैं, बल्कि वे उम्मीदवारों के चयन पर भी अपनी राय व्यक्त करना चाहते हैं।
नोटा का बढ़ता प्रयोग राजनीतिक दलों को गंभीर आत्मनिरीक्षण के लिए प्रेरित करता है। यह संकेत देता है कि मतदाताओं को केवल विकल्प देने से काम नहीं चलेगा, बल्कि उन्हें ऐसे उम्मीदवार देने होंगे जो उनकी अपेक्षाओं पर खरे उतरें। यह एक प्रकार का ‘मौन विरोध’ है जो लोकतंत्र में मतदाताओं की बढ़ती जागरूकता और सक्रिय भागीदारी को दर्शाता है।
राज्य स्तर पर भी नोटा ने अपनी छाप छोड़ी है। बिहार में 2015 के विधानसभा चुनावों के दौरान, नोटा का प्रभाव इतना व्यापक था कि 18 विधानसभा सीटों पर इसे मिले वोट जीत-हार के अंतर से भी अधिक थे। गोपालपुर विधानसभा सीट इसका एक प्रमुख उदाहरण है, जहां जीत का अंतर 5,019 मतों का था, जबकि नोटा का बटन 5,042 लोगों ने दबाया था। यह स्पष्ट रूप से दर्शाता है कि यदि मतदाताओं को उपयुक्त उम्मीदवार नहीं मिलते हैं, तो वे अपनी असहमति व्यक्त करने में संकोच नहीं करते।
भागलपुर में नोटा के बढ़ते आंकड़े, भले ही उन्होंने किसी प्रत्याशी की जीत-हार को सीधे प्रभावित न किया हो, फिर भी यह एक महत्वपूर्ण लोकतांत्रिक संकेतक है। यह राजनीतिक दलों के लिए एक चेतावनी है कि वे मतदाताओं की पसंद और नापसंद को गंभीरता से लें और भविष्य में बेहतर तथा अधिक स्वीकार्य उम्मीदवारों को मैदान में उतारें।
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