आगरा की शिल्पी सिकरवार ने पारंपरिक खेती को बनाया मुनाफे का सौदा, 200 बेटियों को दिखाया नया रास्ता | agra news
खेती को हमेशा से घाटे का सौदा और कठिन परिश्रम वाला पुरुष प्रधान क्षेत्र माना जाता है, लेकिन इस धारणा को आगरा जिले के शमशाबाद स्थित बड़ा गांव की रहने वाली 26 वर्षीय शिल्पी सिकरवार ने पूरी तरह बदल दिया है। बचपन से अपने पिता को खेती में मौसम की मार झेलते और संघर्ष करते देखने वाली शिल्पी ने ठान लिया था कि वह इस तस्वीर को बदलकर दिखाएंगी। उन्होंने कृषि विज्ञान में अपनी पढ़ाई को केवल किताबी ज्ञान तक सीमित न रखकर इसे धरातल पर उतारा और अपनी मास्टर्स की डिग्री पूरी करने के बाद कॉर्पोरेट नौकरी के बजाय अपने खेतों को अपनी कर्मभूमि चुना।
पारंपरिक फसलों के चक्र से बाहर निकलते हुए शिल्पी ने कृषि वैज्ञानिकों के मार्गदर्शन में अपनी तीन एकड़ जमीन पर आलू के साथ-साथ मूंग, कद्दू, खीरा, टमाटर और अन्य मौसमी सब्जियों की वैज्ञानिक विधि से खेती शुरू की। उन्होंने रासायनिक खादों के दुष्प्रभावों से बचते हुए पूरी तरह जैविक खेती पर जोर दिया, जिससे न केवल मिट्टी की उर्वरता बची रही बल्कि उपज की गुणवत्ता और मुनाफा भी कई गुना बढ़ गया। हैरानी की बात यह है कि शिल्पी खुद ट्रैक्टर चलाने से लेकर बुवाई, कटाई और मंडियों में अपनी फसल की बिक्री तक की कमान खुद संभालती हैं। उनकी इस मेहनत और आधुनिक सोच ने पारंपरिक खेती को एक आधुनिक बिजनेस में बदल दिया है।
अपनी व्यक्तिगत सफलता तक सीमित न रहकर शिल्पी ने ग्रामीण महिलाओं और बेटियों के आर्थिक सशक्तीकरण की दिशा में एक बड़ा कदम उठाया। उन्होंने दो साल पहले एक किसान उत्पादक संगठन की नींव रखी, जिसके माध्यम से आज करीब 200 से ज्यादा बेटियां और महिलाएं उनके साथ कंधे से कंधा मिलाकर खेती कर रही हैं। ये महिलाएं अब आधुनिक तरीकों से कैश क्रॉप उगाकर आर्थिक रूप से मजबूत हो रही हैं। जो लोग कभी एक लड़की के खेती संभालने पर सवाल उठाया करते थे, आज वही लोग कृषि को लाभ का व्यवसाय बनाने के लिए शिल्पी से सलाह लेते हैं। उनकी यह पहल ग्रामीण युवाओं के लिए एक प्रेरणा बन चुकी है कि यदि सही दिशा और जुनून हो, तो कृषि क्षेत्र में भी अभूतपूर्व सफलता हासिल की जा सकती है।
