सरयू से रामलला के प्राचीन विग्रह कैसे मिले? 220 साल पुराना इतिहास जानें
अयोध्या के स्वर्गद्वार मोहल्ले में स्थित कालेराम मंदिर, श्रीराम जन्मभूमि के मूल मंदिर के प्राचीन विग्रहों का घर है। यह मंदिर सदियों पुराने इतिहास को समेटे हुए है, जो मुगल आक्रमणों के दौर से गुजरकर आज भी आस्था का प्रतीक बना हुआ है।
विक्रमादित्य का मंदिर और मुगल आक्रमण
इतिहास के अनुसार, उज्जैन नरेश महाराज विक्रमादित्य ने श्रीराम जन्मभूमि पर एक भव्य मंदिर का निर्माण कराया था। हालांकि, मुगल आक्रांताओं ने इस मंदिर को ध्वस्त कर दिया। उस समय मंदिर के पुजारी श्यामानंद ने भगवान के विग्रहों को बचाने के लिए उन्हें सरयू नदी में प्रवाहित कर दिया। करीब 220 वर्षों तक ये विग्रह सरयू की धारा में सुरक्षित रहे।
संत मोघे द्वारा विग्रहों की प्राप्ति
18वीं सदी के उत्तरार्ध में, महाराष्ट्र से आए संत नरसिंह राव मोघे को स्वप्न में दिव्य आदेश मिला। इस आदेश के अनुसार, उन्होंने सरयू नदी से पंचायतन विग्रह प्राप्त किए, जो एक ही काले शिलाखंड में निर्मित थे। इन विग्रहों को प्राप्त करने के बाद उन्हें ‘कालेराम’ नाम दिया गया और इसी नाम से मंदिर विख्यात हुआ। यह घटना लगभग 1748 ईस्वी में घटित हुई थी।
विग्रह की अनूठी विशेषता
कालेराम मंदिर के विग्रह की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यह एक ही काले शिलाखंड में संपूर्ण राम दरबार को दर्शाता है, जिसमें भगवान राम, सीता, भरत, लक्ष्मण, शत्रुघ्न और हनुमान जी एक साथ विराजमान हैं। मंदिर के व्यवस्थापक गोपाल राव देशपांडे बताते हैं कि इस विग्रह में राम और सीता की अभेद एकता का प्रतीक है।
ऐतिहासिक संबंध और संतों का आगमन
यह विग्रह महाराज विक्रमादित्य द्वारा बनवाए गए पांच मंदिरों के विग्रहों में से एक है, जो एक ही कालखंड में निर्मित हुए थे। इनमें अयोध्या की बड़ी देवकाली मंदिर, कनक भवन, राजगद्दी और लक्ष्मण घाट स्थित शेषावतार मंदिर के विग्रह भी शामिल हैं। कालेराम मंदिर महान संतों की साधना का केंद्र भी रहा है। समर्थ गुरु रामदास और गोंदवलेकर महाराज जैसे पूजनीय संत यहां दर्शन के लिए आ चुके हैं। आज इस मंदिर की व्यवस्था संत मोघे की आठवीं पीढ़ी के आचार्यगण संभाल रहे हैं।
