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हनुमानगढ़ी: सनातन धर्म की सेना का प्रशिक्षण केंद्र, 12 साल की कठोर साधना के बाद नागा उपाधि

By Jun 27, 2026

अयोध्या की पावन भूमि पर स्थित हनुमानगढ़ी, सनातन धर्म की अजेय शक्ति का प्रतीक है। यह केवल एक मंदिर नहीं, बल्कि धर्म रक्षा के लिए नागा साधुओं की एक सुप्रशिक्षित फौज तैयार करने का केंद्र है। यहां साधु शस्त्र और शास्त्र दोनों में पारंगत होते हैं। निर्वाणी अनी अखाड़े का यह मुख्यालय सदियों से आध्यात्मिक साधकों और योद्धा संन्यासियों को दिशा देता आया है।

मध्यकाल में सनातन धर्म और मंदिरों पर बढ़ते खतरों को देखते हुए, स्वामी बालानंद ने सन 1760 में इन अनी अखाड़ों की स्थापना की। इसका उद्देश्य एक ऐसी संगठित धार्मिक सेना तैयार करना था जो धर्म की रक्षा के लिए शस्त्र और शास्त्र दोनों में निपुण हो। इन अखाड़ों की शाखाएं आज पूरे उत्तर भारत में फैली हुई हैं।

निर्वाणी अनी अखाड़े का मुख्यालय हनुमानगढ़ी में है, जहां नागा साधुओं को शस्त्र विद्या और शास्त्र ज्ञान की व्यवस्थित शिक्षा दी जाती है। रामानंदीय परंपरा की तीनों अनियों के अंतर्गत 18 उप अखाड़े भी हैं, जो सनातन धर्म की रक्षा के लिए निरंतर सक्रिय रहते हैं।

अखाड़े में नागा साधु बनना एक 12 साल की लंबी और अनुशासित यात्रा है। इसमें तीन पड़ाव शामिल हैं: छोरा (4 वर्ष), हुड़दंगा (4 वर्ष), और मुरेठिया (4 वर्ष)। इस कठोर साधना के बाद, विशेष समारोहों में मुरेठिया साधुओं को नागा की उपाधि प्रदान की जाती है।

हनुमानगढ़ी अखाड़ा 1825 से पंजीकृत है और इसकी संपत्ति चार पट्टियों में बंटी है। आंतरिक व्यवस्था लोकतांत्रिक सिद्धांतों पर आधारित है, जहां पट्टियों के पंच सामूहिक निर्णय लेते हैं। गद्दी नशीन महंत का पद जीवनपर्यंत का होता है और वे मंदिर परिसर से बाहर नहीं जा सकते।

हनुमानगढ़ी का विशाल परिसर 52 बीघे भूमि पर फैला है, जो अवध के नवाब मंसूर अली खां द्वारा बाबा अभयराम दास के आशीर्वाद से स्वस्थ होने पर दान में दी गई थी। यह ऐतिहासिक भूमि आज भी अखाड़े की संपत्ति है।

इन अखाड़ों की शक्ति और संगठन का भव्य प्रदर्शन कुंभ मेले के अवसर पर शाही सवारी के रूप में होता है, जो लाखों श्रद्धालुओं को आकर्षित करता है।

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