0

ग्राम प्रहरी: नाम बदला, पर डेढ़ सदी से उपेक्षा का शिकार, 2500 रुपये में कैसे जिएं?

By Jun 22, 2026

अंबेडकरनगर में तैनात ग्राम प्रहरी, जिन्हें कभी विलेज गार्ड, चौकीदार या ग्राम प्रहरी जैसे नामों से जाना जाता रहा है, आज भी उपेक्षा के शिकार हैं। पीढ़ियों से गांव की सुरक्षा और व्यवस्था बनाए रखने की जिम्मेदारी निभाने वाले इन प्रहरियों का मानदेय मात्र 2,500 रुपये मासिक है, जो आज के महंगाई के दौर में परिवार पालने के लिए अपर्याप्त है। 1873 के उत्तर-पश्चिमी प्रांत ग्राम पुलिस अधिनियम के तहत अस्तित्व में आए ये प्रहरी, ब्रिटिश हुकूमत में नियमित पुलिस का विस्तार माने जाते थे और इन्हें आधिकारिक दर्जा हासिल था।

डेढ़ सदी से अधिक समय बीत जाने के बावजूद, इन प्रहरियों की स्थिति में कोई खास बदलाव नहीं आया है। पुराने कपड़े, घिसी हुई चप्पलें और माथे पर चिंता की लकीरें इनकी कहानी बयां करती हैं। जहां एक आम दिहाड़ी मजदूर भी महीने में दस से बारह हजार रुपये कमा लेता है, वहीं ये प्रहरी, जो रात-रात भर जागकर पहरा देते हैं, उन्हें मात्र 2,500 रुपये मिलते हैं। कई प्रहरियों को मजबूरन दूसरे काम करने पड़ते हैं, जिससे उनकी मुख्य ड्यूटी प्रभावित होती है।

ग्राम प्रहरी गांव और पुलिस प्रशासन के बीच एक महत्वपूर्ण कड़ी हैं। चोरी, मारपीट या किसी संदिग्ध गतिविधि की सूचना सबसे पहले इन्हीं के माध्यम से थाने तक पहुंचती है। लेकिन विडंबना यह है कि इनके पास न तो मोबाइल फोन है, न वॉकी-टॉकी, और न ही कोई आधुनिक संचार साधन। आपात स्थिति में सूचना देने के लिए इन्हें खुद थाने दौड़ना पड़ता है या किसी गांव वाले से फोन मांगना पड़ता है। इसके अतिरिक्त, इन्हें थाने की सफाई जैसे अन्य सहायक काम भी करने पड़ते हैं, जो उनकी मूल जिम्मेदारी से परे हैं।

ग्राम प्रहरियों की मांग है कि उन्हें उचित संसाधन और सम्मानजनक मानदेय मिले, ताकि वे अपनी जिम्मेदारियों का निर्वहन बेहतर ढंग से कर सकें और एक इंसान की तरह जी सकें। बिना छुट्टी, भत्ते और सम्मान के डेढ़ सदी से सेवा कर रहे इन प्रहरियों की तकदीर कब बदलेगी, यह एक बड़ा सवाल है।

About

Journalist covering latest updates.

साझा करें