रायबरेली: जर्जर स्कूल भवन में मासूमों की जान जोखिम में, 68 साल से 40 रुपये किराया
रायबरेली जिले के सहट इलाके में स्थित एक परिषदीय प्राथमिक विद्यालय की स्थिति चिंताजनक है। यह स्कूल पिछले 68 वर्षों से एक निजी भवन में संचालित हो रहा है, जिसका मासिक किराया मात्र 40 रुपये है। भवन इतना जर्जर हो चुका है कि छत और दीवारें कभी भी गिर सकती हैं, जिससे यहां पढ़ने आने वाले दर्जनों मासूम बच्चों की जान लगातार जोखिम में है।
भवन की मालकिन, 80 वर्षीय सेवानिवृत्त शिक्षिका विदुषी श्रीवास्तव, पिछले सात सालों से इस भवन को खाली कराने के लिए सरकारी दफ्तरों के चक्कर काट रही हैं। उन्होंने लिखित रूप से स्पष्ट कर दिया है कि किसी भी दुर्घटना की जिम्मेदारी विभाग की होगी। इसके बावजूद, विभाग की ओर से केवल आश्वासन ही मिल रहा है। विडंबना यह है कि 40 रुपये का किराया लेने जाने में मकान मालकिन को ऑटो पर 60 रुपये खर्च करने पड़ते हैं, जिससे उन्हें आर्थिक नुकसान हो रहा है।
अतिरिक्त स्कूलों का संचालन और अनदेखी
मामला केवल किराए तक सीमित नहीं है। मकान मालकिन की अनुमति के बिना, उसी जर्जर परिसर में एक और प्राइमरी स्कूल और दो आंगनबाड़ी केंद्र भी चलाए जा रहे हैं। जब प्रशासन ने तीसरी आंगनबाड़ी भी शुरू करने की कोशिश की, तो विदुषी जी ने मजबूर होकर ताला लगा दिया। अधिकारियों ने भवन खाली कराने का आश्वासन देकर ताला खुलवाया, लेकिन वह आश्वासन आज तक पूरा नहीं हुआ।
सरकारी नियमों का उल्लंघन
सरकारी नियमों के अनुसार, किसी भी जर्जर भवन में स्कूल संचालित नहीं होना चाहिए। इसके बावजूद, यहां इस नियम का पालन नहीं हो रहा है। विदुषी श्रीवास्तव ने इस संबंध में कई बार मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से भी गुहार लगाई है, लेकिन समस्या का समाधान नहीं हुआ है। आरोप है कि विभाग के एक कर्मचारी ने भवन खाली कराने के एवज में रिश्वत ली, जिसके बाद से काम अटका हुआ है।
प्रशासन का आश्वासन
जिला बेसिक शिक्षा अधिकारी राहुल सिंह ने स्वीकार किया है कि मामला उनके संज्ञान में है और स्कूल को जल्द ही दूसरे भवन में स्थानांतरित करने की प्रक्रिया चल रही है। हालांकि, इस प्रक्रिया में हो रही देरी बच्चों की सुरक्षा पर सवाल खड़े कर रही है। यह स्थिति सरकारी स्कूलों के प्रबंधन और बुनियादी ढांचे की स्थिति पर गंभीर सवाल उठाती है, जहाँ बच्चों की सुरक्षा को प्राथमिकता दी जानी चाहिए।
