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रामकथा का वैश्विक प्रसार: 28 हजार रामायण पांडुलिपियों का होगा संरक्षण, तीन दुर्लभ कृतियों को मिलेगा राम मंदिर में स्थान

By Jun 15, 2026

सनातन संस्कृति की अमर गाथा रामकथा अब केवल भारत तक सीमित नहीं है, बल्कि सदियों पहले ही विभिन्न भाषाओं और संस्कृतियों में अपनी अमिट छाप छोड़ चुकी है। अब श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट ने राम मंदिर के दूसरे तल पर स्थित राम नाम मंदिर में देश-विदेश में उपलब्ध रामायण की दुर्लभ पांडुलिपियों को संरक्षित करने और उनके डिजिटल संस्करण से श्रद्धालुओं को परिचित कराने की एक ऐतिहासिक योजना पर काम शुरू किया है। इस योजना के तहत, फिलहाल तीन ऐसी दुर्लभ पांडुलिपियों की खोज शुरू हुई है जो धार्मिक, भाषाई, सांस्कृतिक और ऐतिहासिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। इनमें तमिलनाडु के तंजावुर में संरक्षित एक विलक्षण संस्कृत पांडुलिपि है, जिसे एक दिशा में पढ़ने पर रामकथा और विपरीत दिशा में पढ़ने पर कृष्णकथा प्रकट होती है। इसके अलावा, मुगलकाल में फारसी भाषा में रची गई रामायण की पांडुलिपि और विलुप्त होने के कगार पर खड़ी ताई जनजाति के पास संरक्षित ताई भाषा की रामायण की मूल प्रति को भी प्राप्त करने के प्रयास किए जा रहे हैं। यह पहल दर्शाती है कि राम केवल एक आस्था नहीं, बल्कि एक वैश्विक सांस्कृतिक चेतना हैं।

इस महत्वाकांक्षी योजना को साकार करने के लिए, अवकाश प्राप्त आईएएस अधिकारी और प्रधानमंत्री कार्यालय के सलाहकार नृपेंद्र मिश्र की अध्यक्षता में पांडुलिपि विशेषज्ञों की एक उच्चस्तरीय कमेटी का गठन किया गया है। इस कमेटी की पहली बैठक में विशेषज्ञों की राय के अनुसार, दो श्रेणियों में पांडुलिपियों को प्राप्त करने का निर्णय लिया गया: अत्यंत दुर्लभ पांडुलिपियां और शोध की दृष्टि से महत्वपूर्ण अन्य पांडुलिपियां। दुर्लभ श्रेणी की तीन अलग-अलग पांडुलिपियों की खोज पहले ही शुरू हो चुकी है।

तमिलनाडु के तंजावुर स्थित विश्वप्रसिद्ध सरस्वती महल पुस्तकालय में चित्र बंध रामायण की पांडुलिपि के केवल चतुर्थ सर्ग तक के अंश उपलब्ध हैं। पांचवें सर्ग के बाद की शेष रचना अभी भी अप्राप्त है, जो इस कृति की खोज को और भी रोमांचक बनाती है। विद्वानों का मानना है कि 16वीं शताब्दी में कवि यज्ञराज ने ताड़ पत्र पर यह अनुपम रचना की थी। यह कृति काव्य और चित्रकला का एक दुर्लभ संगम है, जो भारतीय साहित्य की अद्वितीय परंपरा का प्रतिनिधित्व करती है।

यह कृति मुख्यतः संस्कृत भाषा में है, जिसमें रामायण की कथा को विभिन्न चित्र बंधों के माध्यम से कलात्मक ढंग से प्रस्तुत किया गया है। कवि ने शब्दों को इस प्रकार व्यवस्थित किया है कि वे कमल, रथ, धनुष या तलवार जैसी आकृतियां बनाते हैं। काव्य और दृश्य कला के इस संयोजन को देखकर आज भी विद्वान और कलाप्रेमी विस्मित हो जाते हैं।

इस दुर्लभ चित्र बंध रामायण का सबसे विलक्षण तकनीकी पक्ष इसका अनुलोम-विलोम काव्य है। इसके 30 श्लोक इस प्रकार रचे गए हैं कि उन्हें बाएं से दाएं पढ़ने पर रामायण की कथा और दाएं से बाएं पढ़ने पर श्रीकृष्ण की कथा प्रकट होती है। इस प्रकार, इसमें कुल 60 श्लोक हैं, जिनमें 30 मुख्य और 30 उनके प्रतिलोम हैं। उदाहरण के लिए, एक श्लोक श्रीराम के अयोध्या लौटने की कथा सुनाता है, तो उसी श्लोक को उल्टा पढ़ने पर वह श्रीकृष्ण की स्तुति बन जाता है। यह प्राचीन पांडुलिपियों की उस गौरवशाली विधा का हिस्सा है जिसे तंजावुर के मराठा राजा सेरफोजी द्वितीय ने 1798 से 1832 के मध्य संरक्षित कराया था। ताड़ के पत्तों पर लिखित यह पांडुलिपि भाषा और साहित्य के क्षेत्र में अपनी तरह का एकमात्र उदाहरण है।

राम मंदिर के दूसरे तल पर दुर्लभतम पांडुलिपियों को स्थान देने के निर्णय के परिप्रेक्ष्य में, एक अत्यंत महत्वपूर्ण पांडुलिपि की सूचना प्राप्त हुई है जिसे राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर एक अनूठा ग्रंथ माना जा सकता है। ज्ञानपीठ पुरस्कार से अलंकृत आचार्य सत्यव्रत शास्त्री ने श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट को यह जानकारी दी कि यदि भाषाई प्रतिबद्धता से ऊपर उठकर देखा जाए, तो इस पांडुलिपि को निस्संदेह दुर्लभतम श्रेणी में रखा जाना चाहिए।

आचार्य शास्त्री के अनुसार, इस ऐतिहासिक पांडुलिपि की रचना मुगल सम्राट अकबर के शासनकाल में सन 1584 से 1588 ईस्वी के मध्य हुई थी और इसके रचनाकार अब्दुल कादिर बदायूंनी थे। यह तथ्य स्वयं इस बात का प्रमाण है कि रामकथा का प्रभाव किसी एक भाषा, धर्म या समुदाय की सीमाओं में कभी नहीं बंधा। यह भी बताया गया कि तत्कालीन राजनीतिक और सामाजिक परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए बदायूंनी ने इस अमूल्य पांडुलिपि के संरक्षण के लिए…

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