PCS officer अलंकार अग्निहोत्री का निलंबन: UP में क्यों चर्चा में है यह मामला?
बरेली में सिटी मजिस्ट्रेट के पद पर तैनात पीसीएस अधिकारी अलंकार अग्निहोत्री के इस्तीफे ने प्रशासनिक अमले में हड़कंप मचा दिया है। उन्होंने अपने पद से इस्तीफा देते हुए सोशल मीडिया पर सरकार की नीतियों के खिलाफ टिप्पणी की थी। इसके तुरंत बाद, शासन ने उनका इस्तीफा स्वीकार करने के बजाय उन्हें निलंबित कर दिया और विभागीय जांच (Departmental Inquiry) के आदेश दिए।
अलंकार अग्निहोत्री की सबसे बड़ी चूक ‘उत्तर प्रदेश सरकारी सेवक आचरण नियमावली’ की अनदेखी मानी जा रही है। नियमावली के अनुसार, कोई भी सरकारी अधिकारी सीधे तौर पर किसी राजनीतिक दल के विरुद्ध मोर्चा नहीं खोल सकता। अग्निहोत्री ने अपनी पोस्ट में ‘बॉयकॉट भाजपा’ लिखकर अनुशासन की लक्ष्मण रेखा लांघ दी। इसके अलावा, उन्होंने सरकार की नीतियों को ‘काला कानून’ बताया, जिसने शासन को सख्त कार्रवाई का ठोस आधार दे दिया।
सरकारी सेवा में इस्तीफा देने का एक तय प्रोटोकॉल होता है, जिसे नियुक्ति प्राधिकारी (Appointing Authority) के पास भेजा जाता है। अलंकार ने इस्तीफे को सोशल मीडिया पर सार्वजनिक किया और सरकार की नीतियों पर सवाल उठाए। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि वे केवल व्यक्तिगत कारणों से इस्तीफा देते तो शायद मामला इतना तूल न पकड़ता, लेकिन राजनीतिक नारेबाजी ने इसे ‘विद्रोह’ का रूप दे दिया।
अलंकार अग्निहोत्री का मामला बताता है कि व्यवस्था के भीतर रहकर सुधार की गुंजाइश तो होती है, लेकिन व्यवस्था के विरुद्ध ‘सत्याग्रह’ का रास्ता एक सरकारी अधिकारी के लिए करियर के अंत की शुरुआत हो सकता है। प्रशासन में ‘तटस्थता’ (Neutrality) सबसे अनिवार्य गुण है, जिसकी कमी यहां साफ नजर आई।
बरेली कमिश्नर को सौंपी गई जांच में अब अलंकार के पिछले रिकॉर्ड और उनके सोशल मीडिया व्यवहार की बारीकी से जांच होगी। निलंबन के दौरान वे शामली डीएम कार्यालय में उपस्थिति देंगे और उन्हें केवल आधा वेतन (गुजारा भत्ता) मिलेगा। यदि जांच में यह सिद्ध हो गया कि उन्होंने जानबूझकर सरकार की छवि खराब करने के लिए ऐसा किया तो उनकी सेवा स्थायी रूप से समाप्त भी की जा सकती है।
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