आजादी के बाद भारत का पहला बजट: बंटवारे, रेलवे संकट और 660 करोड़ के बोझ के बीच कैसी थी शुरुआत?
आजादी का जश्न अभी खत्म भी नहीं हुआ था कि देश के सामने चुनौतियों का पहाड़ खड़ा हो गया। 1947 में भारत को अपना पहला बजट पेश करना था, लेकिन खजाना खाली था और बंटवारे का दर्द ताजा था। लाखों शरणार्थी एक जगह से दूसरी जगह जा रहे थे, शहरों का स्वरूप बदल रहा था और देश की अर्थव्यवस्था की रीढ़ मानी जाने वाली रेलवे खुद पटरी से उतरी हुई थी। ऐसे मुश्किल समय में भारत ने अपना पहला बजट (1947-48) पेश किया, जो पूरे साल के लिए नहीं, बल्कि सिर्फ साढ़े सात महीने के लिए था। यह बजट सिर्फ वित्तीय हिसाब-किताब नहीं था, बल्कि टूटते-बिखरते देश को संभालने की शुरुआती कोशिशों की कहानी था।
रेलवे संकट: बंटवारे की सबसे बड़ी मार
बंटवारा सिर्फ जमीन का नहीं, बल्कि देश की आर्थिक धड़कन का भी हुआ था। रेलवे उस दौर में सिर्फ सफर का साधन नहीं, बल्कि देश की आर्थिक धुरी थी। लेकिन 1947 के बंटवारे ने रेलवे को बुरी तरह प्रभावित किया। बड़ी संख्या में रेलवे कर्मचारी पाकिस्तान चले गए, जिससे स्टाफ की कमी हो गई। कई महत्वपूर्ण रेल रूट अचानक अंतरराष्ट्रीय सीमा के पार चले गए। इससे ट्रेनों की टाइमिंग गड़बड़ा गई, मालगाड़ियां अटकने लगीं और सप्लाई चेन टूट गई।
सबसे बड़ी मार कोयले की सप्लाई पर पड़ी। 1946 के दौरान कोयले की ढुलाई में तेज गिरावट आई। इसका नतीजा यह हुआ कि फैक्ट्रियां प्रभावित हुईं, बिजली उत्पादन पर असर पड़ा और खुद ट्रेनों को चलाना भी मुश्किल हो गया। माल ढुलाई के लिए इस्तेमाल होने वाले वैगनों का टर्नअराउंड टाइम (एक चक्कर पूरा करने में लगने वाला समय) 9-10 दिन से बढ़कर 14-15 दिन हो गया। इसका सीधा मतलब था कि माल ढुलाई की क्षमता 40 से 50% तक घट गई थी।
वित्तीय विवाद और 660 करोड़ का बोझ
बंटवारे में सिर्फ ट्रैक ही नहीं, रेलवे की संपत्तियों और कर्ज का भी बंटवारा होना था। भारत का तर्क था कि बंटवारा बुक वैल्यू माइनस डेप्रिसिएशन के आधार पर हो, जबकि पाकिस्तान रेलवे की कमाई की क्षमता के आधार पर बंटवारा चाहता था। अगर भारत की बात मानी जाती, तो भारत पर करीब 660 करोड़ रुपए की पूंजी देनदारी आती। लेकिन अगर पाकिस्तान का फॉर्मूला लागू होता, तो यह बोझ बढ़कर 757 करोड़ रुपए तक पहुंच सकता था। यह विवाद इतना गहरा था कि इसे आर्बिट्रल ट्रिब्यूनल तक ले जाना पड़ा।
शरणार्थी संकट और प्रशासनिक चुनौती
बंटवारे का असर सिर्फ वित्तीय नहीं, बल्कि मानवीय भी था। रेलवे बजट दस्तावेज के अनुसार, करीब 1,26,300 रेलवे कर्मचारियों ने पाकिस्तान से भारत आने का विकल्प चुना। इनमें से लगभग 1,08,400 लोग भारत पहुंच चुके थे और उन्हें नई पोस्टिंग दी जा चुकी थी। दूसरी तरफ, करीब 83,000 कर्मचारी भारत से पाकिस्तान जाने का विकल्प चुन चुके थे। इतने बड़े पैमाने पर कर्मचारियों का ट्रांसफर, उनके परिवारों की बसावट और नई जगह पर काम शुरू कराना, यह अपने आप में एक ऐतिहासिक प्रशासनिक चुनौती थी।
रेलवे सिर्फ अपने स्टाफ को ही नहीं, बल्कि लाखों शरणार्थियों को भी ढो रही थी। ट्रेनों में लोग, सामान और यादें सब कुछ भरकर चल रहा था। सामान्य यात्री सेवाएं कम करनी पड़ीं, क्योंकि ट्रेनें राहत और बचाव का साधन बन चुकी थीं। इससे आम यात्रियों को दिक्कत हुई, लेकिन हालात ऐसे थे कि प्राथमिकता इंसानों की जान बचाना थी।
बजट में समाधान: किराया वृद्धि का फैसला
यह बजट 15 अगस्त 1947 से 31 मार्च 1948 तक के लिए था। इस दौरान सरकार को शरणार्थियों के पुनर्वास, दंगों से हुई तबाही और नए प्रशासन की स्थापना पर भारी खर्च करना था। रेलवे खुद घाटे में थी, इसलिए उससे आम बजट को मदद मिलने की उम्मीद नहीं थी। उल्टा खर्च बढ़ रहे थे, वेतन आयोग की सिफारिशें, कोयले और अनाज की बढ़ती कीमतें, और कर्मचारियों की नई सेवा शर्तें, इन सबने रेलवे की कमर तोड़ दी थी। सरकार के पास विकल्प सीमित थे। घाटा कम करने के लिए रेलवे किरायों और माल भाड़े में बढ़ोतरी का रास्ता चुना गया।
