जाति व्यवस्था राष्ट्र निर्माण में बाधा: मिथिलेश, सामाजिक समरसता पर जोर
कानपुर में आयोजित राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के हिन्दू सम्मेलन में जाति व्यवस्था पर तीखी टिप्पणी की गई। इसे राष्ट्र निर्माण में एक बड़ी सामाजिक बुराई करार दिया गया। सम्मेलन में विश्व कल्याण के लिए सामाजिक समरसता, पर्यावरण संरक्षण, परिवार और संस्कारों को बचाने का आह्वान किया गया।
संघ के पूर्वी क्षेत्र के बौद्धिक प्रमुख मिथिलेश नारायण ने कहा कि वैदिक और सनातन संस्कृतियां, दोनों ही हिन्दू संस्कृति के भिन्न रूप हैं। उन्होंने भारतीय संस्कृति की नींव को मानवीय और सांस्कृतिक मूल्यों पर आधारित बताया, जो भौतिकता पर केंद्रित विश्व की अन्य संस्कृतियों से अलग है। स्वामी विवेकानंद के विचारों का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि दरिद्र को भगवान मानना केवल भारतीय संस्कृति का संस्कार है।
मिथिलेश नारायण ने इस बात पर जोर दिया कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ‘हिन्दू-हिन्दू भाई-भाई’ का नारा इसलिए देता है क्योंकि भारत की सभी जातियों के लोग भारत माता की संतानें हैं। संघ ने पांच प्रमुख परिवर्तनों का लक्ष्य निर्धारित किया है: कुटुंब प्रबोधन, सामाजिक समरसता, पर्यावरण संरक्षण, स्वदेशी और नागरिक कर्तव्य।
समाजसेवी नीतू सिंह ने पर्यावरण की बिगड़ती स्थिति पर चिंता व्यक्त की और कहा कि हिन्दू संस्कृति विश्व कल्याण के सिद्धांत पर आगे बढ़ती है। स्वामी नरेश्वरानंद ने स्वामी विवेकानंद के जीवन की घटनाओं से धर्म और मानवता के महत्व को समझाया। कार्यक्रम की अध्यक्षता उमाशंकर भारतीय ने की।
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