20 साल पुराने AIIMS Scam में बलजीत बरी, दिल्ली कोर्ट ने CBI जांच पर उठाए सवाल
राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली की एक अदालत ने अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (AIIMS) में फर्जी नियुक्ति पत्रों के जरिए नौकरी दिलाने से जुड़े करीब दो दशक पुराने भर्ती घोटाले में एक आरोपी बलजीत सिंह को बरी कर दिया है। राउज एवेन्यू कोर्ट की अतिरिक्त मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट ज्योति माहेश्वरी की अदालत ने स्पष्ट रूप से कहा कि केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) लंबी जांच और इतने वर्षों तक चले ट्रायल के बावजूद आरोपी की भूमिका साबित करने में पूरी तरह असफल रही। यह फैसला न्याय प्रक्रिया में सबूतों की अहमियत और जांच एजेंसियों की जवाबदेही को रेखांकित करता है।
यह मामला वर्ष 2003-04 का है, जब कुछ अभ्यर्थियों को एम्स में क्लर्क ग्रेड-तीन और हॉस्पिटल अटेंडेंट के पदों पर भर्ती के नाम पर फर्जी नियुक्ति पत्र दिए गए थे। एम्स प्रशासन की शिकायत पर सीबीआई ने इस संबंध में मामला दर्ज कर जांच शुरू की थी। इस बहुचर्चित AIIMS Scam में कुल छह आरोपी थे, जिनमें से कुछ को पहले ही दोषी ठहराया जा चुका है, जबकि कुछ बरी हुए हैं।
अदालत ने अपने विस्तृत फैसले में बताया कि आरोपी बलजीत पर जिन उम्मीदवारों के कथित इंटरव्यू लेने का आरोप था, उनमें से किसी भी गवाह ने कोर्ट में उसकी पहचान नहीं की। इसके अलावा, न तो आरोपी से किसी प्रकार की रकम की बरामदगी हुई और न ही ऐसा कोई दस्तावेज सामने आया, जिससे यह साबित हो सके कि वह भर्ती घोटाले का हिस्सा था। कोर्ट ने यह भी रेखांकित किया कि सीबीआई का मामला मुख्य रूप से एक ऐसे गवाह के बयान पर आधारित था, जो ट्रायल के दौरान मृत्यु के कारण अदालत में पेश ही नहीं हो सका। अदालत ने टेस्ट आइडेंटिफिकेशन परेड (टीआईपी) से आरोपी के इनकार को भी दोषसिद्धि का आधार मानने से इनकार कर दिया।
अदालत ने अपने फैसले में कहा कि आरोपी बलजीत सिंह करीब 20 वर्षों तक मुकदमे की मानसिक और सामाजिक पीड़ा झेलता रहा, जबकि उसके खिलाफ कोई विश्वसनीय साक्ष्य रिकॉर्ड पर नहीं था। इन सभी परिस्थितियों को देखते हुए अदालत ने आरोपी को सभी आरोपों से बरी कर दिया। इस मामले में अन्य आरोपी जैसे अवेधश कुमार दुबे, शंभू राय उर्फ अमित, सुरेंद्र प्रसाद शर्मा और राजिंदर सिंह ढिल्लों को पहले ही दोषी ठहराया जा चुका है, जबकि कमल गुप्ता को 2022 में बरी किया गया था।
