अरावली खनन मामले में सुप्रीम कोर्ट ने नई परिभाषा पर उठाए सवाल, कहा- ‘संरक्षण के उद्देश्य को कमजोर कर रही है’
सुप्रीम कोर्ट ने अरावली पर्वत श्रृंखला में खनन को लेकर एक महत्वपूर्ण टिप्पणी की है। कोर्ट ने कहा कि अरावली की नई परिभाषा से संरक्षण के उद्देश्य कमजोर हो सकते हैं। कोर्ट ने 2026 तक अपने पिछले आदेश के कार्यान्वयन पर रोक लगा दी है। कोर्ट ने एक उच्च-शक्ति विशेषज्ञ समिति बनाने का प्रस्ताव दिया है, जो नई परिभाषा के संभावित प्रभावों का अध्ययन करेगी। कोर्ट ने कहा कि नई परिभाषा से 11,000 से अधिक पहाड़ियों पर खनन की अनुमति मिल सकती है, जो पर्यावरण के लिए चिंताजनक है।
संरक्षण क्षेत्र को संकुचित करने पर चिंता
मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि नई परिभाषा से संरक्षण क्षेत्र को संकुचित करने का एक विरोधाभास पैदा हो सकता है। कोर्ट ने सवाल उठाया कि क्या 500 मीटर के क्षेत्र तक अरावली की परिभाषा को सीमित करने से संरक्षण क्षेत्र संकीर्ण हो जाएगा। कोर्ट ने यह भी पूछा कि क्या इस परिभाषा से गैर-अरावली क्षेत्रों का दायरा बढ़ जाएगा, जहां खनन की अनुमति दी जा सकती है।
विशेषज्ञ समिति का गठन
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि नई परिभाषा के कार्यान्वयन से पहले एक निष्पक्ष और स्वतंत्र विश्लेषण की आवश्यकता है। कोर्ट ने एक उच्च-शक्ति विशेषज्ञ समिति बनाने का प्रस्ताव दिया है, जिसमें डोमेन विशेषज्ञ शामिल होंगे। यह समिति नई परिभाषा के संभावित प्रभावों का अध्ययन करेगी और अपनी रिपोर्ट कोर्ट को सौंपेगी। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि कोई भी खनन योजना तब तक लागू नहीं की जा सकती जब तक कि उसे कोर्ट की मंजूरी न मिल जाए।
11,000 पहाड़ियों पर खनन की आशंका
कोर्ट ने सरकार से स्पष्टीकरण मांगा कि क्या यह आलोचना सही है कि नई परिभाषा के तहत 11,000 से अधिक पहाड़ियों पर खनन की अनुमति मिल जाएगी। कोर्ट ने कहा कि इस तरह के निष्कर्ष पर पहुंचने के लिए वैज्ञानिक मैपिंग की आवश्यकता है। कोर्ट ने यह भी पूछा कि 500 मीटर से अधिक के अंतराल वाली पहाड़ियों के बीच की दूरी को कैसे माना जाएगा और इन मामलों में क्या नीति लागू होगी। कोर्ट ने कहा कि सभी हितधारकों के विचारों को ध्यान में रखा जाना चाहिए।
