28 साल बाद पटना HC से गोविंद पासवान बरी, किशनगंज डकैती मामले में मिला न्याय
पटना हाई कोर्ट ने 28 साल पुराने एक डकैती मामले में अहम फैसला सुनाते हुए अभियुक्त गोविंद पासवान को बरी कर दिया है। यह मामला किशनगंज जिले से जुड़ा है, जहाँ 1997 में कथित तौर पर डकैती हुई थी। इस फैसले के साथ ही गोविंद पासवान के सिर से 28 वर्षों का एक बड़ा दाग धुल गया है।
पहचान प्रक्रिया में खामियां
न्यायाधीश आलोक कुमार पांडेय की एकलपीठ ने 27 पृष्ठों के विस्तृत निर्णय में पाया कि अभियोजन की कहानी और पहचान प्रक्रिया में गंभीर खामियां थीं। अदालत ने कहा कि सूचक ने प्राथमिकी में कहा था कि वह डकैतों को पहचानने में सक्षम है, लेकिन पहचान परेड के दौरान उसने अपने ही घर के पास रहने वाले एक दुकानदार को डकैत बताकर पहचान लिया। अदालत ने इस विरोधाभास पर सवाल उठाया कि यदि सूचक उस दुकानदार को पहले से जानता था, तो यह बात प्राथमिकी में स्पष्ट क्यों नहीं की गई। इस बिंदु ने सूचक की मंशा पर संदेह पैदा किया।
मामले की पृष्ठभूमि
यह घटना 4 अप्रैल 1997 की रात की है। किशनगंज के कोचाधामन थाना क्षेत्र में सूचक के घर 10-12 डकैतों द्वारा कथित तौर पर डकैती की गई थी। आरोप था कि घर में घुसकर परिजनों पर हमला किया गया और नकदी व आभूषण सहित अन्य सामान लूटा गया। पुलिस ने कांड संख्या 46/1997 दर्ज कर आईपीसी की धारा 395 व 397 के तहत मुकदमा चलाया। वर्ष 2004 में किशनगंज ट्रायल कोर्ट ने अभियुक्त गोविंद पासवान को सात वर्ष के कठोर कारावास की सजा सुनाई थी।
हाई कोर्ट का हस्तक्षेप और रिहाई
सजा के बाद, गोविंद पासवान ने हाई कोर्ट का रुख किया। अपील में बचाव पक्ष ने दलील दी कि अभियुक्त एक दुकानदार है और अदरक की बिक्री को लेकर पुराने विवाद के कारण उसे झूठे मुकदमे में फंसाया गया था। उच्च न्यायालय ने सभी साक्ष्यों पर विचार करने के बाद निचली अदालत के दोषसिद्धि और सजा के आदेश को रद्द कर दिया और अभियुक्त को तत्काल रिहा करने का निर्देश दिया। इस तरह, 28 वर्षों तक चले इस कानूनी सफर के बाद आखिरकार गोविंद पासवान को न्याय मिला और वे दोषमुक्त हुए। इस फैसले से न्याय प्रणाली में आम आदमी का विश्वास और मजबूत होता है, क्योंकि यह दिखाता है कि सत्य की जीत देर से ही सही, पर अवश्य होती है।
