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66 साल पहले दान की गई जमीन पर सरकारी लापरवाही, डिग्री कॉलेज का सपना टूटा

By Dec 5, 2025

नावकोठी, बेगूसराय। 66 वर्ष पूर्व क्षेत्र के शिक्षाविदों और ग्रामीणों ने जिस राम कुमारी अयोध्या डिग्री कॉलेज की स्थापना कर उच्च शिक्षा के प्रसार का सपना देखा था, वह आज सरकारी लापरवाही और स्थानीय स्तर पर हुई मनमानी के कारण दम तोड़ चुका है। 1960 में स्थापित यह कॉलेज आज केवल एक नाम मात्र रह गया है, जबकि इसके निर्माण के लिए कई बुद्धिजीवियों और किसानों ने अपनी 40 बीघा से अधिक कीमती भूमि दान की थी।

इस क्षेत्र में उच्च शिक्षा की नींव 1935 में अयोध्या प्रसाद सिंह मध्य विद्यालय की स्थापना से रखी गई थी, जिसे 1948 में उच्च विद्यालय के रूप में मजबूत किया गया। इसके बाद, आठ अगस्त 1960 को गांव के शिक्षाप्रेमी और समाजसेवियों ने मिलकर राम कुमारी अयोध्या डिग्री कॉलेज की स्थापना की। कॉलेज के लिए भूमि दान करने वालों में अयोध्या प्रसाद सिंह ट्रस्ट स्टेट, गुरु शंकर प्रसाद सिंह, माला देवी, बद्रीनाथ सिंह जैसे बड़े दानदाताओं के साथ-साथ कई छोटे किसानों ने भी अपना अमूल्य योगदान दिया था। दान की गई यह 40 बीघा भूमि तत्कालीन राज्यपाल, बिहार के नाम पर विधिवत पंजीकृत भी कराई गई थी। कॉलेज को संबद्धता दिलाने के लिए ग्रामीणों ने चंदा इकट्ठा कर 25 हजार रुपये भागलपुर विश्वविद्यालय में जमा किए थे, जो आज सूद सहित लाखों में तब्दील हो चुके होते।

प्रारंभिक तीन वर्षों तक कॉलेज में पठन-पाठन सुचारू रूप से चला। कॉलेज के शासी निकाय में उस समय एसडीओ बेगूसराय चितरंजन प्रसाद सिंह अध्यक्ष तथा स्वतंत्रता सेनानी डॉ. सहदेव प्रसाद सिंह सचिव के पद पर थे। सूत्रों के अनुसार, 82 वर्षीय सेवानिवृत्त शिक्षक शिवनंदन सिंह बताते हैं कि उस दौर में कॉलेज का परीक्षा केंद्र कोसी कॉलेज, खगड़िया होता था और छात्र वहीं से परीक्षा देकर अपनी डिग्रियां प्राप्त करते थे।

हालांकि, कुछ वर्षों के बाद आपसी मतभेदों के कारण प्रोफेसरों का वेतन रुक गया और धीरे-धीरे कॉलेज की शिक्षा व्यवस्था पूरी तरह ठप पड़ गई। इस स्थिति की सबसे बड़ी त्रासदी तब हुई जब सरकारी अकर्मण्यता का बोलबाला रहा। राज्यपाल के नाम रजिस्टर्ड कॉलेज की भूमि को 1975 में, यानी स्थापना के करीब 15 साल बाद, पर्चा काटकर स्थानीय स्तर पर अन्य लोगों को आवंटित कर दिया गया। यह नियमों का सरासर उल्लंघन था और इसने कॉलेज के पुनर्जीवन की लगभग सभी संभावनाओं को समाप्त कर दिया।

आज भी क्षेत्र के बुद्धिजीवी और ग्रामीण कॉलेज की पुनर्स्थापना की मांग कर रहे हैं। उनका कहना है कि जिस उच्च शिक्षा संस्थान के लिए उन्होंने अपनी जमीन और परिश्रम दान किया, उसे सरकारी उदासीनता और प्रशासनिक अनदेखी ने बर्बाद कर दिया। यह घटना क्षेत्र में उच्च शिक्षा की कमी और सरकारी तंत्र की विफलता को उजागर करती है।

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