भारतीय मूल की ब्रिटिश जासूस नूर इनायत खान: नाजी शासन के खिलाफ एक अनमोल योद्धा
द्वितीय विश्व युद्ध के अंधेरे दौर में, जब नाजी शासन ने फ्रांस को अपनी गिरफ्त में ले रखा था, एक भारतीय मूल की ब्रिटिश महिला ने अदम्य साहस का परिचय दिया। नूर इनायत खान, एक शांत स्वभाव की लेखिका और संगीतकार, जो अपने आदर्शवादी परिवार में पली-बढ़ी थीं, ने इतिहास के पन्नों में अपना नाम सुनहरे अक्षरों में दर्ज कराया। चाइल्ड साइकोलॉजी में डिग्री और फ्रेंच-अंग्रेजी में लेखन का करियर शुरू करने वाली नूर ने शायद कभी सोचा भी नहीं होगा कि वह तानाशाह हिटलर की सेना के खिलाफ गुप्त मिशन पर जाएंगी।
नूर इनायत खान ने एक असाधारण कदम उठाया और ब्रिटेन की ओर से नाजी-कब्जे वाले फ्रांस में भेजी जाने वाली पहली महिला वायरलेस ऑपरेटर बनीं। उनका शांत और सीधा-सादा व्यक्तित्व उनकी असली पहचान को छिपाने में मददगार साबित हुआ। फ्रांसीसी प्रतिरोध में उनकी भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण थी। उन्होंने ऐसे गुप्त संदेशों का आदान-प्रदान किया, जिन्होंने नाजी शासन की नींव को हिलाने में अहम योगदान दिया। उनकी बहादुरी और समर्पण ने अनगिनत लोगों को प्रेरित किया, लेकिन इस निस्वार्थ सेवा की उन्हें भारी कीमत चुकानी पड़ी।
तीस वर्षीय नूर को गेस्टापो, यानी नाजी गुप्त पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया और 1944 में उन्हें बेरहमी से मौत के घाट उतार दिया गया। लेकिन उनकी शहादत व्यर्थ नहीं गई। 18वीं सदी के मैसूर शासक टीपू सुल्तान की वंशज नूर को फ्रांस ने मरणोपरांत एक विशेष पोस्टेज स्टैम्प से सम्मानित किया है। यह सम्मान फ्रांस की ओर से मरणोपरांत सम्मानित होने वाली एकमात्र भारतीय मूल की महिला के रूप में उनकी असाधारण सेवा को मान्यता देता है। हाल ही में, युद्ध समाप्त होने की 80वीं वर्षगांठ के उपलक्ष्य में जारी किए गए डाक टिकटों के एक सेट में, नूर को युद्ध के 12 नायकों और नायिकाओं में से एक के रूप में शामिल किया गया है।
नूर की जीवनी ‘स्पाई प्रिंसेस: द लाइफ ऑफ नूर इनायत खान’ की लेखिका श्राबनी बसु ने फ्रांस द्वारा नूर को सम्मानित किए जाने पर खुशी व्यक्त की है। उन्होंने कहा कि यह सम्मान, युद्ध की समाप्ति की 80वीं वर्षगांठ के साथ मेल खाता है, जो इसे और भी महत्वपूर्ण बनाता है। बसु ने कहा, “नूर ने फासीवाद के खिलाफ लड़ाई में अपनी जान कुर्बान कर दी।” उन्होंने आगे कहा कि ब्रिटेन ने 2014 में नूर के जन्म की सौवीं वर्षगांठ पर उन्हें सम्मानित किया था, और अब ब्रिटेन और फ्रांस दोनों ने उनके सम्मान में डाक टिकट जारी किए हैं। बसु ने इस बात पर जोर दिया कि अब समय आ गया है कि भारत, जो उनके पूर्वजों का देश है, भी उन्हें एक पोस्टेज स्टैम्प से सम्मानित करे।
1914 में मॉस्को में जन्मी नूर-उन-निसा इनायत खान की परवरिश और पृष्ठभूमि किसी भी अन्य एजेंट से बिल्कुल अलग थी। उनके पिता, इनायत खान, एक सूफी फकीर और संगीतकार थे, जिन्होंने सूफीवाद को पश्चिम में फैलाने के लिए बड़ौदा छोड़ दिया था। नूर की मां अमेरिकी थीं और वह टीपू सुल्तान की परपोती थीं। नूर ने अपने शुरुआती साल लंदन में बिताए और बाद में पेरिस में अपनी स्कूली शिक्षा पूरी की। उनका बचपन शास्त्रीय संगीत, साहित्य, आध्यात्मिक शिक्षाओं और लोकगीतों के बीच बीता। एक शांत, चिंतनशील और बच्चों की कहानियां लिखने वाली नूर का युद्ध के समय एक गुप्त एजेंट बनना, सूफी परंपराओं में पली-बढ़ी पृष्ठभूमि को देखते हुए, लगभग अकल्पनीय लगता था।
उन्होंने संगीत की छह साल तक पढ़ाई की, चाइल्ड साइकोलॉजी में डिग्री हासिल की और हिंदी भी सीखी। उनकी एक लेखक के रूप में पहचान बनाने की ख्वाहिश थी और वह बच्चों का अखबार शुरू करना चाहती थीं। हालांकि, 1940 में फासीवाद के बढ़ते प्रभाव और फ्रांस के पतन की घटनाओं ने उन्हें गहराई से प्रभावित किया, जिसके बाद नूर अपने परिवार के साथ इंग्लैंड चली गईं और यहीं से उनके जीवन का एक नया, साहसिक अध्याय शुरू हुआ।
