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बक्सर के लाल डॉ. अरुण कुमार का यूके जर्नल में प्रकाशित हुआ शोध, नवजात शिशुओं के स्वास्थ्य पर नई दिशा

By Nov 29, 2025

बिहार के बक्सर जिले के डुमरांव अनुमंडल क्षेत्र के खड़रिचा गांव के युवा वैज्ञानिक डॉ. अरुण कुमार के मानव कल्याणकारी शोध ने दुनियाभर में प्रशंसा बटोरी है। उनका महत्वपूर्ण शोध, जो प्रसूति महिलाओं के स्तन दूध में यूरेनियम की उपस्थिति और नवजात शिशुओं के स्वास्थ्य पर इसके संभावित प्रतिकूल प्रभावों से संबंधित है, यूके के प्रतिष्ठित नेचर साइंटिफिक रिपोर्ट्स जर्नल में प्रकाशित हुआ है। यह वैज्ञानिक समुदाय में एक बड़ी उपलब्धि मानी जा रही है, जिससे बक्सर क्षेत्र में खुशी की लहर दौड़ गई है।

यह शोध पहली बार इस बात का खुलासा करता है कि स्तन दूध में पाए जाने वाले यूरेनियम से शिशुओं में गैर-कैंसरजन्य स्वास्थ्य जोखिम की संभावना बढ़ सकती है। महावीर कैंसर संस्थान और अनुसंधान संस्थान, पटना के वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. अरुण कुमार और उनकी शोध टीम ने इस अध्ययन को अंजाम दिया है। शोध कार्य को यूके के नेचर साइंटिफिक रिपोर्ट्स जर्नल ने 21 नवंबर, 2025 को प्रकाशित किया है। यह दुनिया में इस विषय पर प्रकाशित होने वाला पहला शोध है।

इस शोध का मुख्य उद्देश्य स्तनपान कराने वाली माताओं के स्तन दूध के माध्यम से शिशुओं में यूरेनियम के संपर्क का मूल्यांकन करना था। इसके लिए बिहार के विभिन्न जिलों से 40 स्तनपान कराने वाली महिलाओं का यादृच्छिक चयन किया गया था। डॉ. कुमार के अनुसार, अध्ययन में स्तन के दूध में यूरेनियम की मात्रा 0 से 5.25 माइक्रोग्राम प्रति लीटर के बीच पाई गई, जो विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) द्वारा पानी के लिए निर्धारित 10 माइक्रोग्राम प्रति लीटर की अनुमानित सुरक्षित सीमा से कम है। हालांकि, शोधकर्ताओं ने पाया कि लगभग 70% शिशु आबादी में गैर-कैंसरजन्य स्वास्थ्य संबंधी प्रभाव पैदा करने की क्षमता मौजूद थी।

शोध के दौरान, बिहार के अन्य जिलों की तुलना में कटिहार जिले के स्तन दूध के नमूनों में यूरेनियम-238 की मात्रा सबसे अधिक पाई गई। डॉ. कुमार ने इस बात पर जोर दिया कि इन क्षेत्रों में व्यापक स्तर पर यू-238 की जैव निगरानी की आवश्यकता है। उन्होंने बताया कि स्तन दूध में यूरेनियम की मौजूदगी से शिशुओं में नेफ्रोटॉक्सिसिटी (गुर्दे को नुकसान) हो सकती है, जो बचपन में संपर्क में आने पर दीर्घकालिक गुर्दे की क्षति का कारण बन सकती है। साथ ही, यह तंत्रिका संबंधी विकास को भी प्रभावित कर सकता है। डॉ. कुमार ने यह भी स्पष्ट किया कि डब्ल्यूएचओ द्वारा अब तक स्तन दूध में यूरेनियम के स्तर के लिए कोई विशिष्ट सीमा तय नहीं की गई है, और माताएं अपने शिशुओं को सामान्य रूप से स्तनपान करा सकती हैं, क्योंकि यूरेनियम प्राकृतिक रूप से पानी और मिट्टी में पाया जाता है।

इस महत्वपूर्ण शोध कार्य में महावीर कैंसर संस्थान सह अनुसंधान संस्थान के विभागाध्यक्ष प्रो. अशोक कुमार घोष, डॉ. तेजस्वी पांडेय, डॉ. मोहम्मद अली, डॉ. अभिनव श्रीवास्तव, डॉ. राजीव कुमार, डॉ. चिंरजीवी खंडेलवाल, डॉ. मनीषा सिंह, भूगर्भ सर्वे ऑफ इंडिया के वैज्ञानिक डॉ. अखौरी प्रिया, यूपीईएस देहरादून के वैज्ञानिक डॉ. ध्रुव कुमार, वैज्ञानिक रामलिंगन पीरामन, आइपर हाजीपुर के राहुल लक्ष्मण, डॉ. अशोक शर्मा और डॉ. समीर ढींगवाल सहित कई अन्य वैज्ञानिक भी शामिल थे। महावीर अनुसंधान संस्थान के कन्हैया कुमार, गोविंद कुमार, राधिका अग्रवाल और शिवकुमार ने भी सहयोगी के रूप में योगदान दिया।

डॉ. अरुण कुमार बक्सर जिले के खड़रिचा गांव के मूल निवासी हैं। वे एयरफोर्स के अवकाश प्राप्त अभियंता मोती प्रसाद और प्रभावती देवी के तीन पुत्रों में सबसे छोटे हैं। वे पिछले 15 सालों से महावीर कैंसर संस्थान सह अनुसंधान संस्थान में वरिष्ठ वैज्ञानिक के रूप में कार्यरत हैं और कैंसर से जुड़े विभिन्न महत्वपूर्ण शोधों के अलावा पानी में आर्सेनिक और पित्ताशय की थैली के कैंसर जैसे रोगों पर भी शोध कार्य कर चुके हैं। उनके शोध के प्रयासों के चलते ही वर्ष 2021 में जापान विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी एजेंसी, टोक्यो की सहायता से महावीर कैंसर संस्थान में एक शोध केंद्र की स्थापना हुई थी।

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