2027 UP Politics News: मायावती ने शुरू की तैयारी, सोशल इंजीनियरिंग पर फोकस
बहुजन समाज पार्टी (बसपा) की राष्ट्रीय अध्यक्ष मायावती ने उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2027 के लिए एक साल पहले ही बिसात बिछाना शुरू कर दिया है। उम्मीदवारों के चयन में मायावती ने एक बार फिर अपने पुराने और सफल ‘सोशल इंजीनियरिंग’ फॉर्मूले को लागू किया है। इसमें ब्राह्मण और मुस्लिम समीकरणों पर विशेष जोर दिया गया है। पार्टी ने फिलहाल चार विधानसभा सीटों के लिए प्रभारियों का ऐलान किया है। बसपा में विधानसभा प्रभारी को ही उम्मीदवार बनाए जाने की परंपरा रही है, ऐसे में इन चारों को अगला प्रत्याशी माना जा रहा है।
मायावती ने जिन चार महत्वपूर्ण सीटों पर प्रभारियों की घोषणा की है, उनमें दो ब्राह्मण और दो मुस्लिम चेहरे शामिल हैं। मायावती ने जालौन, आजमगढ़, जौनपुर और सहारनपुर की सीटों के लिए मुस्लिम और ब्राह्मण कार्ड खेला है।
सबसे पहले जालौन की माधोगढ़ सीट से ब्राह्मण नेता आशीष पांडे को प्रभारी बनाया गया। इसके बाद आजमगढ़ की दीदारगंज विधानसभा सीट पर अबुल कैश आजमी, जौनपुर की मुंगरा बादशाहपुर विधानसभा सीट पर विनोद और सहारनपुर देहात विधानसभा सीट पर फिरोज आफताब को प्रभारी बनाया गया है।
मायावती का लक्ष्य 2007 के उस सोशल इंजीनियरिंग मॉडल को दोहराना है, जिसने बसपा को पूर्ण बहुमत दिलाया था। पार्टी का मानना है कि दलित वोटबैंक के साथ अगर ब्राह्मण और मुस्लिम मतदाता जुड़ते हैं तो बसपा मुख्य मुकाबले में लौट सकती है।
मौजूदा राजनीतिक परिदृश्य में ब्राह्मण समाज के एक वर्ग में सत्ता पक्ष को लेकर देखी जा रही कथित नाराजगी को मायावती अपने पक्ष में मोड़ना चाहती हैं। इसी रणनीति के तहत उन्होंने पहला प्रभारी पद एक ब्राह्मण चेहरे को दिया है।
मायावती ने अगले 2-3 महीनों के भीतर करीब 100 विधानसभा सीटों पर प्रभारियों के नाम तय करने का लक्ष्य रखा है। इसके लिए मंडल और जोनल को-ऑर्डिनेटरों की एक टीम प्रत्येक सीट पर 4-4 दावेदारों के पैनल की जांच कर रही है।
मायावती ने स्पष्ट कर दिया है कि 2027 में बसपा किसी भी बड़े दल (सपा, भाजपा या कांग्रेस) के साथ गठबंधन नहीं करेगी। उनका मानना है कि गठबंधन से बसपा का वोट दूसरी पार्टियों में ट्रांसफर हो जाता है, लेकिन दूसरी पार्टियों का वोट बसपा को नहीं मिलता।
यूपी में 2007 में अकेले पूर्ण बहुमत की सरकार बनाने वाली बसपा का लगातार उसके बाद से ग्राफ गिर रहा है। स्थिति यह है कि मौजूदा विधानसभा में बसपा का केवल एक विधायक है। 2012 के विधानसभा चुनाव में बसपा सपा से मुकाबले में थी लेकिन उसके बाद चुनाव दर चुनाव स्थिति बिगड़ती चली गई। 2019 के लोकसभा चुनाव में सपा के साथ मिलकर चुनाव लड़ने का भी खास फायदा नहीं हुआ।
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