10,000 साल बाद इथियोपियाई ज्वालामुखी फटा: भारत पर भी असर की आशंका
इथियोपिया के दूरस्थ दनाकिल इलाके में स्थित हैली गुब्बी ज्वालामुखी में एक अत्यंत दुर्लभ घटनाक्रम के तहत विस्फोट हुआ है। यह ज्वालामुखी, जो लगभग 10,000 से 12,000 वर्षों से शांत था, अचानक सक्रिय हो गया। यह क्षेत्र एरटा एले ज्वालामुखी से लगभग 15 किलोमीटर दक्षिण-पूर्व में स्थित है, जो अपनी निरंतर सक्रियता के लिए जाना जाता है।
स्थानीय समयानुसार सुबह करीब 8:30 बजे हुए इस विस्फोट से 10 से 15 किलोमीटर की ऊंचाई तक राख का एक विशाल बादल उठा। यह राख का गुबार हवा के साथ बहकर दक्षिण-पश्चिमी अरब प्रायद्वीप की ओर बढ़ चला है। सैटेलाइट इमेजरी ने इस राख के साथ-साथ सल्फर डाइऑक्साइड (SO₂) की बड़ी मात्रा का भी पता लगाया है, जो ज्वालामुखी की गतिविधि का एक महत्वपूर्ण संकेतक है।
वैज्ञानिकों के अनुसार, हैली गुब्बी एक शील्ड-टाइप ज्वालामुखी है और इसके होलोसीन काल (पिछले कुछ हजार वर्षों) में किसी भी विस्फोट का कोई ऐतिहासिक रिकॉर्ड नहीं है। इतने लंबे समय बाद इसका पुनः सक्रिय होना भूवैज्ञानिकों के लिए विशेष रुचि का विषय है। यह अफार रिफ्ट क्षेत्र में हो रही गहरी भूगर्भीय गतिविधियों के बारे में नई जानकारी प्रदान कर सकता है, जहां अफ्रीकी टेक्टोनिक प्लेट धीरे-धीरे अलग हो रही है।
हालांकि यह इलाका आबादी से दूर और दुर्गम है, जिससे तत्काल किसी बड़े जान-माल के नुकसान की कोई खबर नहीं है, लेकिन इतनी ऊंचाई तक पहुंची राख विमानों के लिए एक गंभीर खतरा पैदा कर सकती है। उड़ानों को प्रभावित करने की आशंका जताई जा रही है। इसके अतिरिक्त, जमीन पर गिरने वाली राख स्थानीय चरवाहों और पारिस्थितिकी तंत्र पर भी प्रतिकूल प्रभाव डाल सकती है।
ताजा जानकारी के अनुसार, विस्फोट का सबसे तीव्र चरण अब थम गया है। वैज्ञानिक अभी भी लावा की गतिविधि, भूकंपीय कंपनों और गैस उत्सर्जन के स्तर पर कड़ी निगरानी रख रहे हैं। उनका उद्देश्य यह आकलन करना है कि क्या भविष्य में और विस्फोटों की संभावना है या स्थिति नियंत्रण में है। इस दुर्लभ घटना से वैज्ञानिकों को लंबे समय से निष्क्रिय ज्वालामुखी के फिर से सक्रिय होने की प्रक्रियाओं को समझने में मदद मिलेगी।
