“title”: “मधुबनी में महागठबंधन की हार: क्या ‘बिना होमवर्क’ की रणनीति बनी वजह?”,
“subtitle”: “जमीनी स्तर पर समन्वय की कमी, गलत उम्मीदवार चयन और पिछली समीक्षा के अभाव ने बिगाड़ा खेल।”,
“summary”: “मधुबनी में महागठबंधन की चुनावी रणनीति पर गंभीर सवाल उठ रहे हैं। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि बिना ठोस गृहकार्य और जमीनी स्तर पर समन्वय की कमी के कारण गठबंधन को हार का सामना करना पड़ा। पिछली चुनावी नतीजों की अनदेखी कर गलत उम्मीदवारों को टिकट देना, आंतरिक खींचतान और अंतिम समय तक प्रत्याशी चयन में देरी जैसी खामियों ने कार्यकर्ताओं में निराशा भर दी और जनता की अपेक्षाओं को पूरा करने में बाधा उत्पन्न की।”,
“content”: “मधुबनी में हालिया चुनावी नतीजों के बाद महागठबंधन की रणनीति पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि ‘बिना होमवर्क’ की रणनीति अपनाने से गठबंधन की राह बेहद मुश्किल हो गई, जिसका सीधा असर उसके प्रदर्शन पर पड़ा। जमीनी स्तर पर समन्वय और ठोस योजना की कमी के कारण कार्यकर्ताओं में गहरी निराशा देखने को मिली, जो अंततः चुनावी नतीजों में परिलक्षित हुई।nnएनडीए की प्रचंड जीत के पीछे कई कारण बताए जा रहे हैं, जिनमें मजबूत रणनीति, जदयू और चिराग पासवान का विधानसभा चुनाव में पहली बार साथ आना, और सरकारी योजनाओं जैसे 125 यूनिट मुफ्त बिजली व सामाजिक पेंशन में वृद्धि शामिल हैं। हालांकि, महागठबंधन भी अपनी हार के लिए कम जिम्मेदार नहीं है। मधुबनी की दसों विधानसभा सीटों की समीक्षा से यह स्पष्ट होता है कि किस तरह गठबंधन ने पिछले चुनावी नतीजों की गहन समीक्षा किए बिना ही उम्मीदवारों को मैदान में उतारा।nnखासकर, सीपीआई को झंझारपुर और हरलाखी सीटें देना महागठबंधन की सबसे बड़ी रणनीतिक भूलों में से एक मानी जा रही है। झंझारपुर में सीपीआई के राम नारायण यादव कई चुनावों से लड़ते आ रहे थे। उनके व्यक्तिगत कैडर वोट का स्तर 2010 और 2015 के चुनावी नतीजों से समझा जा सकता है, जब उन्हें क्रमशः 3.83 प्रतिशत और 2.87 प्रतिशत वोट मिले थे। 2020 में राजद और कांग्रेस से जुड़ने के बाद उन्हें 29 प्रतिशत वोट मिले, जबकि नीतीश मिश्रा को 52 प्रतिशत। इन तथ्यात्मक नतीजों के बावजूद झंझारपुर सीट सीपीआई को दी गई और वही उम्मीदवार उतारा गया। इसका नतीजा यह हुआ कि नीतीश मिश्रा ने करीब 56 प्रतिशत वोट हासिल कर आसानी से जीत दर्ज की। एनडीए इस सीट को लेकर इतना आश्वस्त था कि वहां एक भी बड़ी सभा आयोजित नहीं की गई।nnवहीं, हरलाखी में भी सीपीआई के रामनरेश पांडे लगातार हारते रहे थे। उनकी हार के पीछे मो. शब्बीर का फैक्टर कई चुनावों से काम कर रहा था। इस बार भी इस समस्या का समाधान नहीं किया गया और रामनरेश पांडे ने अपने बेटे राकेश कुमार पांडे को सीपीआई के टिकट पर उतार दिया। मो. शब्बीर ने इस बार भी महागठबंधन की हार में भूमिका निभाई, हालांकि इस बार का अंतर उन्हें मिले वोटों से अधिक था।nnराजनगर सीट की बात करें तो भाजपा ने कड़ा निर्णय लेते हुए निवर्तमान विधायक डॉ. रामप्रीत पासवान का टिकट काटकर युवा तुर्क सुजीत पासवान को मौका दिया। इसके विपरीत, राजद को अपना उम्मीदवार तय करने में इतना समय लगा, जैसे प्रत्याशी ही न मिल रहा हो। नामांकन से ठीक एक रात पहले प्रो. बिष्णुदेव मोची को टिकट दिया गया। उसी दिन यह तय हो चुका था कि सुजीत पासवान बड़े अंतर से जीतेंगे और अंततः वह 42 हजार से अधिक वोटों से विजयी हुए।nnबाबूबरही में भी महागठबंधन में खींचतान नाम वापसी के दिन तक बनी रही। जदयू ने मीना कुमारी पर दोबारा भरोसा जताया था, वहीं राजद ने अरुण कुमार सिंह को अंतिम समय पर टिकट दिया और कुशवाहा कार्ड खेला। इसी बीच, वीआइपी के टिकट पर बिंदु गुलाब यादव ने भी नामांकन कर मतदाताओं में भ्रम की स्थिति पैदा कर दी। महागठबंधन के कैडर में संशय की स्थिति बन गई। नाम वापसी के दिन पटना में एक प्रेसवार्ता से पहले बिंदु गुलाब यादव से नामांकन वापस कराया गया।nnमधुबनी, बिस्फी और लौक
