कानपुर में घटता कुश्तियों का आकर्षण, युवाओं की पहली पसंद बने हाई-टेक जिम
कानपुर देहात में कुश्तियों का क्रेज धीरे-धीरे खत्म होता जा रहा है। कभी युवाओं के आकर्षण का केंद्र रहे अखाड़े अब विलुप्तप्राय हो गए हैं, और पहलवानों के बीच कुश्ती के दांव-पेंच शायद ही कभी देखने को मिलते हैं। वर्तमान में, हाई-टेक जिम युवाओं की पहली पसंद बन चुके हैं। युवाओं में उत्साह की कमी के कारण पारंपरिक कुश्ती उपेक्षा का शिकार हो रही है, जिसके परिणामस्वरूप व्यायामशालाएं और अखाड़े अपना अस्तित्व खो रहे हैं।
ढाई दशक पहले, रक्षा बंधन और नाग पंचमी जैसे त्योहारों पर गांवों में अखाड़ों का आयोजन होता था। सावन का महीना शुरू होते ही युवा खेतों में अभ्यास शुरू कर देते थे और पारंपरिक अखाड़ों में कुश्ती के दांव-पेंच सीखते थे। उस समय अकबरपुर, रनियां, झींझक, गढ़िया सिकंदरा, सरगांव बुजुर्ग, उसरी, समायूं असालतगंज, कहिंजरी, मांचा बरौर, सरैया, फत्तेपुर रसूलपुर, असालतगंज, सबलपुर, कहिंजरी और तिश्ती जैसे स्थानों पर अखाड़े संचालित होते थे। बुजुर्गों के अनुसार, फत्तेपुर मूसानगर के अहमद पहलवान, परसद्दापुर के राजाराम यादव और समायूं के गजोधर पहलवान के अखाड़े विशेष रूप से प्रसिद्ध थे। जब कोई पहलवान दूसरे को पटखनी देता, तो दर्शक तालियां बजाकर खुशी मनाते थे। अब ऐसा नजारा केवल मेलों या विशेष अवसरों पर होने वाले दंगलों में ही देखने को मिलता है। अखाड़ों के खत्म होने और युवाओं में आकर्षण घटने से देशी कुश्ती दम तोड़ रही है, और जिले में व्यायामशालाओं का अस्तित्व भी समाप्त हो रहा है। झींझक में बची गांधी व्यायाम शाला भी अवैध कब्जे और दुर्दशा का शिकार हो रही है।
कुश्तियों का जिक्र पौराणिक कथाओं में भी मिलता है। रामायण में बालि-सुग्रीव के बीच मल्लयुद्ध और महाभारत में भीम-दुर्योधन व भीम-जरासंध के बीच मल्ल युद्ध का उल्लेख है। पुराने समय में कुश्ती को मल्लयुद्ध कहा जाता था, क्योंकि दोनों पहलवान युद्ध से पहले बाजुओं में मिट्टी रगड़ते थे। कुछ पारंपरिक दांवों में कलाजंग दांव, जांघिया दांव, धोबी पछाड़ दांव, और कांखी दांव शामिल हैं।
इस बदलते परिदृश्य का सीधा असर युवा पीढ़ी के शारीरिक और मानसिक विकास पर पड़ रहा है, क्योंकि पारंपरिक खेल शारीरिक सहनशक्ति और अनुशासन सिखाते हैं।
