सुप्रीम कोर्ट ने बिहार मतदाता सूची विवाद पर चुनाव आयोग से जवाब मांगने से किया इनकार, जानिए क्यों
सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को एक एनजीओ की याचिका पर चुनाव आयोग से जवाब मांगने से इनकार कर दिया। एनजीओ ने चुनाव आयोग को उस मीडिया रिपोर्ट पर जवाब देने का निर्देश देने की मांग की थी जिसमें आरोप लगाया गया था कि बिहार में विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआइआर) के दौरान मतदाताओं के नाम हटाने के लिए लाखों पूर्व-भरे नोटिस स्थानीय अधिकारियों के बजाय केंद्रीय स्तर पर जारी किए गए थे।
चीफ जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जोयमाल्या बागची की पीठ ने कहा कि इससे एक गलत मिसाल कायम होगी और उन्होंने गैर सरकारी संगठन – एसोसिएशन फार डेमोक्रेटिक रिफार्म्स (एडीआर) को चुनाव आयोग की प्रतिक्रिया मांगने से पहले तथ्यों को ध्यान में रखते हुए एक हलफनामा दाखिल करने को कहा। कोर्ट ने कहा कि जब तक इस मुद्दे को औपचारिक रूप से हलफनामे के माध्यम से रिकार्ड में नहीं लाया जाता, तब तक वह मीडिया रिपोर्ट से प्रभावित नहीं हो सकती।
इस मामले में चुनाव आयोग का प्रतिनिधित्व कर रहे सीनियर एडवोकेट राकेश द्विवेदी ने अखबार की रिपोर्ट पर एनजीओ द्वारा किए गए भरोसे पर आपत्ति जताई और उसमें लगाए गए आरोपों का खंडन किया। उन्होंने कहा कि चुनाव आयोग को उस समय अचानक मीडिया रिपोर्टों पर प्रतिक्रिया देने के लिए कोर्ट में नहीं बुलाया जा सकता जब इस मुद्दे पर महत्वपूर्ण सुनवाई हो चुकी हो। एनजीओ की ओर से पेश हुए सीनियर एडवोकेट प्रशांत भूषण ने कहा कि मीडिया रिपोर्ट में गंभीर आरोप लगाए गए हैं कि बिहार में एसआइआर के दौरान मानदंडों का पालन नहीं किया गया। उन्होंने कहा कि चुनाव आयोग द्वारा मतदाताओं को सीधे लाखों पूर्व-भरे नोटिस भेजे गए जिनमें नाम हटाने का अनुरोध किया गया था, जबकि लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम के तहत ऐसे नोटिस जारी करने का अधिकार केवल स्थानीय निर्वाचन पंजीकरण अधिकारी को है।
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