91 हजार करोड़ का सप्लीमेंट्री बजट: क्या चुनावी वादों की कीमत चुका रही है नीतीश सरकार?
बिहार सरकार द्वारा पेश किया गया 91,717 करोड़ रुपए का दूसरा सप्लीमेंट्री बजट राज्य की आर्थिक संरचना और राजनीतिक प्राथमिकताओं पर कई सवाल खड़े करता है। वित्तीय वर्ष 2025-26 में यह दूसरी बार है जब मुख्य बजट के बाद इतना बड़ा वित्तीय दस्तावेज सदन में लाया गया। यह राशि अपने आप में रिकॉर्ड है और मुख्य बजट के करीब तीन में से एक हिस्से के बराबर है।
सरकार का तर्क है कि लोक कल्याणकारी योजनाओं और नई स्कीमों के सुचारू संचालन के लिए अतिरिक्त राशि की जरूरत पड़ी। लेकिन यह भी सच है कि सप्लीमेंट्री बजट का आकार इतना बड़ा शायद ही कभी देखा गया हो। इससे यह बहस तेज हो गई है कि कहीं बजट अनुमान कमजोर तो नहीं थे या चुनावी वादों ने वित्तीय संतुलन को प्रभावित किया है।
मुख्य बजट में सरकार ने सालाना खर्च का खाका 3.16 लाख करोड़ रुपए तय किया था। लेकिन जुलाई में पहला सप्लीमेंट्री (57,946 करोड़) और दिसंबर में दूसरा सप्लीमेंट्री (91,717 करोड़) मिलाकर कुल 1.49 लाख करोड़ रुपए का अतिरिक्त प्रावधान किया गया। यह मुख्य बजट का 47% हिस्सा है, अर्थात लगभग आधा बजट ऐड-ऑन के रूप में समीक्षा के बाद जोड़ा गया।
योजना मद में तो यह अंतर और भी बड़ा है। मुख्य बजट में योजनाओं के लिए स्वीकृत 1.16 लाख करोड़ रुपए की तुलना में दोनों सप्लीमेंट्री बजट मिलकर 87 हजार करोड़ रुपए योजना मद में जोड़ चुके हैं। यह दर्शाता है कि लोक कल्याण और सब्सिडी आधारित खर्च अचानक बहुत बढ़ गया है।
वित्तीय विशेषज्ञों का दावा है कि चुनावी साल में नीतीश सरकार ने कई बड़े फैसले लिए थे। इन योजनाओं ने खर्च में भारी उछाल पैदा किया। अकेले महिला रोजगार योजना पर 21 हजार करोड़ का प्रावधान सप्लीमेंट्री में किया गया है। यह अपने आप में किसी मध्यम आकार के राज्य के वार्षिक बजट के बराबर है।
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