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रामनगरी मेडिकल कॉलेज में नकली मशीन की खरीद, जेल पोर्टल पर सवाल

By Nov 18, 2025

अयोध्या के रामनगरी स्थित राजर्षि दशरथ मेडिकल कॉलेज में खरीद प्रक्रिया में बड़े फर्जीवाड़े का खुलासा हुआ है। कॉलेज में 80 लीटर की वर्टिकल ऑटोक्लेव मशीन की खरीद में नकली उत्पाद को असली बताकर बेचा गया है। आरोप है कि असली कंपनी का स्टीकर लगाकर नकली मशीन खरीदी गई और इसके लिए तय कीमत से लगभग दोगुनी राशि का भुगतान किया गया।

सूत्रों के अनुसार, इस मशीन की असली कीमत जहां तीन लाख 50 हजार रुपये है, वहीं पांच लाख 99 हजार 990 रुपये में इस नकली मशीन को खरीदा गया। जिस मेहरोत्रा बायोटेक कंपनी का स्टीकर मशीन पर लगाया गया था, उस कंपनी ने स्वयं इस बात से इनकार किया है कि उन्होंने इस मशीन की आपूर्ति की है। बिल और मशीन के स्पेसिफिकेशन्स में भी काफी अंतर पाया गया है।

यह मशीन ब्लड बैंक के लिए खरीदी गई थी, जिसका उपयोग एचआईवी और हेपेटाइटिस जैसे संक्रमणों से युक्त रक्त को सुरक्षित रूप से नष्ट करने के लिए होता है। इसका उद्देश्य अस्पताल कर्मचारियों और बायो-मेडिकल कचरा प्रबंधन से जुड़े लोगों को संक्रमण के खतरे से बचाना है। इस खरीद में हुई जालसाजी का खुलासा होने के बाद विभागाध्यक्ष डॉ. डीके सिंह ने प्राचार्य डॉ. सत्यजीत वर्मा को एक पत्र भेजकर गंभीर आरोप लगाए हैं और मामले की निष्पक्ष जांच की मांग की है।

विभागाध्यक्ष द्वारा भेजे गए पत्र में यह भी उल्लेख किया गया है कि पिछले एक वर्ष से अधिक समय से उपकरणों और सामग्रियों की खरीद से पहले विधिवत समिति की बैठक बुलाकर परीक्षण, सत्यापन और अनुमोदन की मांग की जाती रही है, लेकिन ऐसी कोई नियमित बैठक आयोजित नहीं की गई। इसके बावजूद, उपकरणों और सामग्रियों की खरीद बिना समिति के विचार-विमर्श, परीक्षण और पारदर्शी प्रक्रिया के निरंतर जारी रही, जिसे प्रशासनिक लापरवाही के साथ-साथ वित्तीय अनियमितता का संकेत बताया जा रहा है।

आरोप है कि इसी लापरवाही का परिणाम है कि वर्टिकल आटोक्लेव मशीन मॉडल एसएस-वी 100 एचडी को छह लाख रुपये की कीमत दर्शाते हुए कॉलेज के स्टोर में प्राप्त दिखाया गया और सीधे ब्लड बैंक में स्थापित कर दिया गया। मशीन की उत्पत्ति पर संदेह जताते हुए कहा गया है कि इसे मलहोत्रा बायोटेक कंपनी द्वारा निर्मित दिखाया गया है, जबकि कंपनी से प्राप्त ईमेल और लिखित पुष्टि के अनुसार, उन्होंने न तो ऐसे किसी उपकरण का निर्माण किया है और न ही फर्म से इसकी आपूर्ति की जानकारी दी है। कंपनी के इस जवाब के बाद, यह स्पष्ट हो गया है कि नकली उपकरण को असली बताकर स्थापित किया गया है।

इसके अलावा, वास्तविक कोटेशन की तुलना में इसकी कीमत दोगुनी दर पर खरीदी गई है। इस पूरे मामले में क्रय कर्ता जेम बायर मनीष कुमार वर्मा की भूमिका को भी संदिग्ध बताया जा रहा है। इस खरीद में हुई धांधली से न केवल सरकारी धन का दुरुपयोग हुआ है, बल्कि स्वास्थ्य सेवाओं की गुणवत्ता पर भी सवाल खड़े हो गए हैं।

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