पीलीभीत टाइगर रिजर्व: 11 साल में 11 बाघों को मिली चिड़ियाघर में ‘उम्रकैद’
पीलीभीत टाइगर रिजर्व (पीटीआर) अपनी बाघों की आबादी और पर्यटन के लिए विश्व स्तर पर पहचान बना चुका है। यहां बाघों का दिखना पर्यटकों के लिए आम बात है। हालांकि, एक कड़वा सच यह भी है कि यहां से बचाए गए कुछ बाघों को दोबारा जंगल में आजादी नहीं मिल सकी। उन्हें चिड़ियाघरों में ‘उम्रकैद’ की जिंदगी गुजारनी पड़ रही है।
बाघों को चिड़ियाघर भेजने की वजह
पीटीआर के बाघों का व्यवहार अक्सर शांत रहता है और वे इंसानों को नुकसान नहीं पहुंचाते। लेकिन, कुछ ऐसे मामले भी सामने आए हैं जहां बाघों ने जंगल में अनधिकृत रूप से प्रवेश करने वालों पर हमला किया। ऐसी घटनाओं के बाद वन विभाग को बाघों को रेस्क्यू कर जंगल से बाहर निकालना पड़ा। पिछले 11 वर्षों (2014 से) में, पीटीआर से कुल 11 बाघों और बाघिनों को जंगल से बाहर निकालकर विभिन्न चिड़ियाघरों में भेजा गया है।
रेस्क्यू ऑपरेशन और आंकड़े
पीलीभीत टाइगर रिजर्व घोषित होने के बाद से अब तक 26 रेस्क्यू ऑपरेशन चलाए गए हैं। इनमें पांच शावकों सहित कुल 23 बाघ-बाघिन और छह तेंदुए पकड़े गए। पकड़े गए बाघों में से 12 को जांच और निगरानी के बाद सुरक्षित जंगल में छोड़ दिया गया था। लेकिन, दुर्भाग्यवश, 11 बाघ-बाघिनों को जंगल में वापस नहीं भेजा जा सका और उन्हें लखनऊ, गोरखपुर और कानपुर के चिड़ियाघरों में भेज दिया गया।
चिड़ियाघरों में ‘कैद’ बाघ
इन बाघों का जीवन अब चिड़ियाघरों की मजबूत बाड़ों और चारदीवारी के बीच बीत रहा है। गोरखपुर भेजे गए पीटीआर के चर्चित बाघ ‘केसरी’ की बीमारी से मौत हो चुकी है। वहीं, कानपुर चिड़ियाघर में भेजा गया एक बाघ इन दिनों दर्शकों के बीच खासा लोकप्रिय है। इस बाघ को ‘बघीरा’ नाम दिया गया है, जिसकी आकर्षक चाल-ढाल और अदाएं पर्यटकों को खूब भा रही हैं। पर्यटक सबसे पहले बघीरा को देखने की इच्छा जताते हैं।
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