कानपुर चिड़ियाघर में उल्लू संरक्षण: किसानों के मददगार पक्षी की बदलती धारणा
कानपुर के चिड़ियाघर में उल्लुओं के संरक्षण पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है। समाज में अक्सर बेवकूफ माने जाने वाले उल्लू असल में किसानों के सच्चे मित्र हैं। ये पक्षी फसलों को नुकसान पहुंचाने वाले हजारों चूहों और कीड़ों को खाकर खेतों की रक्षा करते हैं। दुनिया भर में उल्लू की 200 प्रजातियां हैं, जिनमें से 36 भारत में पाई जाती हैं। उल्लू रात में सक्रिय रहते हैं और मुख्य रूप से चूहों का शिकार करते हैं। एक जोड़ा उल्लू साल भर में 1000 से अधिक चूहे खा सकता है, जिससे कृषि को महत्वपूर्ण लाभ होता है।
प्रकृति में संतुलन बनाए रखने वाले इन पक्षियों को अक्सर अंधविश्वास के कारण नुकसान पहुंचाया जाता है, खासकर दिवाली के दौरान। हालांकि, चिड़ियाघर में इनकी बेहतर देखभाल और सुरक्षा के कारण ये अपनी सामान्य उम्र से अधिक जीवित रहते हैं। कानपुर चिड़ियाघर में वर्तमान में दो प्रजातियों के कुल 16 उल्लू संरक्षित हैं, जिनमें काठ के उल्लू और शक्तिशाली ईगल उल्लू शामिल हैं। इन्हें भोजन के रूप में जीवित चूहे और बच्चों के लिए मुर्गी का कीमा दिया जाता है।
